इन महिलाओं ने बनाई कृषि क्षेत्र में नई पहचान

भारत की पहचान कृषि प्रधान देश के रूप में होती है। खेती किसानी का काम करना यहां की परम्परा रही है। कृषि में महिलाओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। पुरूष किसानों के साथ नहिला किसान भी कंध से कंधा मिलाकर चल रही है। महिलाएं कृषि में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं और दूसरे किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन रही हैं। महिलाओं पर आधारित इस ख़ास विशेषांक में हम आपको कुछ ऐसी महिलाओं से मिलवाने जा रहे हैं जो कृषि में अपना नाम करके अच्छी आय अर्जित कर रही हैं और दूसरों को भी प्रेरित कर रही हैं।

इनमें कई महिलाएं ऐसी भी हैं जो अच्छी खासी नौकरी छोड़कर खेती को अपनी आजीविका बना चुकी हैं। कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो कम पढ़ी लिखी होने के बावजूद भी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर खेती करके एक उद्दयमी होने का सपना पूरा किया है। पेश है ऐसी ही कुछ महिलाओं की दास्ताँ :

एक किसान के तौर पर मशरूम की खेती शुरू कर कड़ी की करोडो की कंपनी

  1. दिव्या रावत : यह वह नाम है जिसने खेती की पूरी परिभाषा ही बदलकर रख दी है। जिस उम्र में युवा अपनी पढाई पूरी करने के बाद अच्छी कंपनी में नौकरी की तलाश करते हैं उस उम्र में उत्तराखंड के चमोली जिले से 25 किलोमीटर दूर पहाड़ों की वादियों में बसे कंडारा गावों की रहने वाली दिव्या रावत ने खेती के तरीकों को ही बदल कर रख दिया। दिव्या रावत को मशरूम गर्ल के नाम से भी जाना जाता है।

दिव्या ने दिल्ली से मास्टर्स इन सोशल वर्क में अपनी पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई पूरी होने के बाद और लड़के लड़कियों की तरह वे एक कंपनी में नौकरी करने लगी। वहां मन नहीं लगा जिसके चलते उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। कुछ समय बाद उन्होंने फिर एक बार एक सामाजिक संस्था में नौकरी की। नौकरी करने के दौरान उनके मन में बार-बार यह विचार कौंधा करता था कि क्यू न अपने गांव में ङी कुछ ऐसा किया जाय जिससे यो नौकरी न करनी पड़े और गांव से पलायन हो रहे बड़े तबके को वहां ही रोजगार दिया जाय। एक दिन दिव्या ने नौकरी छोड़ अपने गांव वापस लौटने का निश्चय किया। बस फिर क्या था उन्होंने साल 2013 में अपने गांव वापस लौटकर मशरूम की खेती शुरू कर दी। तब से लेकर आज तक दिव्या रावत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपनी मेहनत के बल पर दिव्या रावत आज एक किसान से उद्यमी बन चुकी है। उन्होंने एक कंपनी का गठन कर उसके साथ अन्य महिलाओं को भी रोजगार दिया है। इस समय उनकी कंपनी का टर्नओवर करोडो में है। उनकी कंपनी की मांग विदेशों में हो रही है, खासबात यह है कि दिव्या ने अपनी स्वयं की रिसर्च लैब स्थापित कर ली है। मशरूम के बाद अब दिव्या कीड़ाजड़ी पर काम कर रही है। उनके द्वारा उत्पादित कीड़ाजड़ी की मांग विश्व के कई देशों में है। यानी अब दिव्या अपनी पहचान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बना चुकी हैं। अपनी कड़ी मेहनत के चलते दिव्या ने पहाड़ों में रोजगार खड़ा किया है जिससे सैकड़ों घरों का पलायन रूक गया है। अब वह दूसरे किसानों को भी मशरूम की ट्रेनिंग देती हैं। इसी के साथ उनको रोजगार भी उपलब्ध करा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी दिव्या रावत की तारीफ कर चुके हैं।

  1. सविता को गरीबी ने बनाया सफल किसान

गरीबी के अभाव में अधिकतर लोग हिम्मत हार जाते हैं, लेकिन महाराष्ट्र के औरंगाबाद की रहने वाली सविता डाकले बुरी परिस्थियों से हारकर पीछे हटने वालों के लिए एक मिसाल है। सविता डाकले का जन्म औरंगाबाद के छोटे से गावों में धनोरा में हुआ था। वह अपने पांच भाई-बहनों में तीसरी नंबर पर थी। परिवार का भरण पोषण करने के लिए सविता के पिता परिवार को लेकर औरंगाबाद शहर में चले गए और वहां पर एक फैक्ट्री में काम करने लगे। लेकिन सिर्फ उनकी कमाई में परिवार के सभी सदस्यों का पेट भरना नामुमकिन था इसलिए सविता की माँ ने भी छोटा-मोटा काम करना शुरू कर दिया। किसी तरह ही परिवार की खर्चा चल रहा था। इसी इस दौरान जवान होती बेटियों की शादी की जिम्मेदारी भी बढती जा रही थी। आखिरकार तंगहाली के चलते सविता को बीच में पढाई छोडनी पड़ी। सविता ने जैसे तैसे करके कक्षा नौ तक की पढाई पूरी की। पढ़ाई छोड़ने के बाद वे एक फैक्ट्री में काम करने लगी ताकि दूसरे भाई बहन पढ़ सकें। मात्र 17 साल की उम्र में सविता की शादी एक किसान परिवार में कर दी गई। सविता का जन्म शहर में हुआ था, लेकिन शादी के बाद उनको गांव में जाना पड़ा। उन्हें वहां के रहन-सहन की आदत नही थी और न ही खेती का काम करना आता था। सविता बताती है इस स्थिति में गांव की महिलाएं उन पर हंसती थी। धीरे-धीरे सविता खेत के काम में निपुण हो गयी। चूंकि उनके खेत में परंपरागत तरीके से कपास की खेती होती थी तो कपास को चुनने में सविता बहुत समय लगाती थी। लेकिन अब वे फटाफट सारी कपास चुन लेती है। सविता कहती हैं कि वे आगे पढ़ना चाहती थी और अपने परिवार के लिए कुछ करना चाहती थी। एक दिन उनके गावों में सेल्फ एम्प्लोयड वीमेन एसोसिएशन (एसईवीई) के अधिकारियों का आना हुआ। संस्था के अधिकारियों ने गांव की महिलाओं को प्रशिक्षण देना शुरू किया। इसी दौरान सविता डाकले भी इस संस्था से जुड़ गयी। महिलाओं को संस्था द्वारा जैविक खेती का प्रशिक्षण भी दिया गया। जिसके बाद सविता ने अपने 1 एकड़ खेत में प्रयोग शुरू कर दिए और उन्होंने कपास के अलावा कई अन्य फसलों की भी जैविक खेती शुरू कर दी। इससे सविता को अच्छा मुनाफा हुआ और सविता अच्छी कमाई करने लगी। इसमें उनके पति ने भी सविता का साथ दिया। इस दौरान सविता ने जैविक खाद बनाना भी सीखा। अब सविता इस 1 एकड़ भूमि से लाखों रूपये कमा रही है। उन्होंने गावों की महिलाओं को भी प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है और गावों में कई बचत समूह भी बनाए है। अब सविता दोबारा से अपनी पढाई कर रही है और आधुनिक तरीकों से खेती कर रही है। सविता दूसरी महिलाओं के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत बन चुकी हैं।

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