Fasal Krati

खुद की नजरें कमजोर पर लोगों को राह दिखाता है यह किसान

Last Updated: July 13, 2019 (03:27 IST)

“अपनी खेती अपना बीज, अपना खाद अपना स्वाद!”  का नारा बुलंद करने प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी को भला कौन नहीं जानता होगा। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के तड़िया गांव निवासी 60 वर्षीय प्रकाश सिंह रघुवंशी मात्र 8वीं कक्षा तक पढ़े हैं। वे न सिर्फ़ जैविक किसान हैं, बल्कि बीज उत्पादक भी हैं। लगभग पिछले 24 वर्षों से प्रकाश सिंह प्राकृतिक ढंग से स्वदेशी बीज की किस्मों को विकसित कर रहे हैं।

गेहूं, धान, दाल और कई तरह की सब्ज़ियों के बीजों की अलग-अलग किस्में तैयार करने के साथ-साथ प्रकाश सिंह देश-विदेश के किसानों को प्राकृतिक खेती करना और स्वयं बीज तैयार करना भी सिखाते हैं। अपने ‘बीजदान महादान’ अभियान के अंतर्गत उन्होंने 10 हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा भारत-भ्रमण किया है और देशभर में बिना पैसे लिए उन्नत किस्म के स्वदेशी बीज किसानों को बांटे हैं। कोई भी किसान उनके गांव जाकर उनके स्वदेशी बीज बैंक से मुफ़्त बीज ले सकता है।

बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उन्होंने प्राकृतिक रूप से बीज विकसित करने का हुनर उन्होंने अपने पिताजी से सीखा। 1964-65 के दौर में जब देश में गेहूं के बीजों की नई-नई किस्में आ रही थीं। तब मेरे पिताजी ने किसानों की मदद के लिए इन बीजों के प्रचार-प्रसार का जिम्मा उठाया था। अनेकों कृषि मेलों में जाकर वे किसानों को बीज बांटते और उन्हें अच्छी फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

पिताजी बेहतरीन किसान होने के साथ ही प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक भी थे। पिताजी ने अपने सभी बच्चों को अच्छे से पढ़ाया-लिखाया, पर एक दुर्घटना के कारण प्रकाश सिंह को अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। वर्ष 1977 में इंजेक्शन के रिएक्शन के कारण 6 महीने तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ा, जिसका सबसे बुरा प्रभाव उनकी आंखों पर पड़ा।

उन्होंने बताया कि रिएक्शन इतना बुरा था मैं अपनी देखने की क्षमता लगभग खो बैठा। इससे उबरने में मुझे काफ़ी वक़्त लगा। तब से ही मैं नज़र का चश्मा लगाता हूं।

परिवारिक ज़िम्मेदारी खराब तबीयत और नजरों के चलते वे ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते थे। मात्र ढाई एकड़ की ज़मीन ही उनके जीवन का सहारा था जिसपर खेती कर वे अपना गुजारा करते थे।  

जैसे-तैसे ही गृहस्थी की गाड़ी चल रही थी। प्रकाश सिंह कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे वे अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे पाएं। कोई रास्ता सूझता न देख उन्हें अपने पिता से पौधों को परखने के हुनर को निखारना शुरू किया।

वर्ष 1995 में एक बार जब मैं अपने खेतों में टहलते हुए गेहूं की फसल को देख रहा था। तभी मेरी नज़र एक पौधे पर पड़ी जो बाकी दूसरे पौधों से अलग था। इसका तना बाकी पौधों से अधिक मोटा था और इस पौधे में 10-12 बालियां लगी थीं। मैंने तुरंत अपने पिताजी को इस बात की जानकारी दी। पिताजी ने कहा कि इस पौधे के बीज की किस्म बाकी पूरी फसल से अलग होगी। बस, फिर मुझे अपना रास्ता मिल गया और मैंने पूरी निष्ठा से इस एक पौधे की देख-रेख की। जब वह पक गया, तब मैंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर इसके बीजों को निकाला। पूरे पौधे की 10-12 बालियों से कुल 1000 दाने मेरे पास इकट्ठे हो गए। मेरी पत्नी ने इन बीजों को बहुत ही सम्भालकर रखा।

अगले सीजन में उन्होंने उन बीजों को लगाया और उन थोड़े-से बीजों से ही उन्हें बहुत उपज मिली। 1-2 सालों तक हमने इसी तरह उस बीज की फसल ली और फिर से हमने अपने खेतों में अलग-अलग किस्म के पौधों को देखे।

प्रकाश सिंह ने कृषि वैज्ञानिकों से जानना चाहा कि आखिर कैसे एक किस्म की फसल में एक-दो अलग किस्म के पौधे उग जाते हैं। वैज्ञानिकों ने उन्हें बताया कि ऐसा नैचुरल क्रॉस पोलिनेशन से सम्भव है।

वर्ष 2000 तक उन्होंने गेहूं, धान और कुछ दालों की कई तरह की किस्में विकसित कर ली। मैंने सभी अलग-अलग किस्मों का डाटा रिकॉर्ड किया और फिर अपनी पत्नी के साथ मिलकर सभी को नाम दिया। चूंकि गेहूं का वह अलग पौधा प्राकृतिक रूप से मिला था, इसलिए उन्होंने सबसे पहले उसके बीज को ‘कुदरत’ नाम दिया और फिर आगे जो उन्होंने अलग-अलग बीज विकसित किए, उन्हें कुदरत-7, कुदरत-9, तो धान की किस्मों को कुदरत 1, कुदरत 2 और लाल बासमती इत्यादि नाम दिया।

अब तक प्रकाश सिंह रघुवंशी गेहूं की लगभग 80, धान की 25 और दालों की 10 से भी ज़्यादा किस्में तैयार कर चुके हैं। इसके अलावा सरसों, मटर आदि के 200 से ज़्यादा किस्म के स्वदेशी बीज विकसित कर चुके हैं। वे इन सभी बीजों को जैविक खाद से ही तैयार करते हैं। उनके नाम 6 फीट की लौकी के बीज तैयार करने का भी रिकॉर्ड दर्ज है।           

प्रकाश सिंह बताते हैं कि मुझे जो कुछ भी मिला है, प्रकृति से मिला है। मैं प्रकृति के इस तोहफे को सबको बांटना चाहता था, ताकि लोग देसी बीजों का इस्तेमाल करें। इसलिए मैंने बीजदान का अभियान शुरू किया। इसके तहत मैं सभी को मुफ्त बीज बांटता हूं। मैंने जितने भी किसानों को बीज बांटे, उन्हें फायदा मिला। कई जगह मुझे सम्मानित भी किया गया। ‘बीजदान-महादान’ के चलते पूरे देश में किसान उन्हें जानते हैं।

उनकी बीज यात्रा के बारे में जानकर बहुत से लोग उनकी आर्थिक मदद के लिए भी आगे आए हैं। बहुतों द्वारा मिली गुप्त दान की वजह से ही उनकी बीज यात्राएं इतनी सफल रहीं और उन्होंने अपने गांव में अपने घर में भी अपनी पत्नी शकुंतला के नाम से ‘स्वदेशी बीज बैंक’ शुरू किया है।

अलग-अलग जगहों पर किसानों को देसी बीज के इस्तेमाल और जैविक खेती करने के लिए जागरूक करने के साथ ही, उन्होंने किसानों के बीच आत्महत्या के खिलाफ़ भी अभियान चलाया है।

प्रकाश सिंह को कई राज्यों, प्राइवेट फर्मों और सरकार द्वारा कई सम्मान मिले हैं। खेती के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने के लिए उन्हें माननीय राष्ट्रपति द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी मिला है। आज विदेशों से भी लोग उनसे बीज तैयार करने की ट्रेनिंग लेने आते हैं। नजर कमजोर पर लोगों को राह दिखाते हैं प्रकाश सिंह रघुवंशी।


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