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मिलिए खेती के 'मास्टर' से, जो ऑनलाइन कृषि मार्केटिंग से कमाते है लाखों रूपये...

Last Updated: January 27, 2019 (23:21 IST)

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से स्नातक की पढ़ाई कर रोजगार की तलाश न कर सोमवर्धन पांडेय ने वापस अपने गांव लौटकर खेती में कुछ ऐसा प्रयोग किया की जापान, थाईलैंड सहित अन्य देशों के कृषि विशेषज्ञों ने उनके गांव का दौरा ही नहीं किया बल्कि उनको मास्टर का दर्जा तक दे डाला. आज अपने गांव से ही इस तकनीक के माध्यम से देश ही नहीं दुनिया में अपने नाम के साथ देश में नाम रौशन कर रहे हैं. साथ-साथ ऑनलाइन मार्केटिंग के जरिये अपने प्रयोग को बाजार में बेच कर 25 लाख रुपये सालाना तक का कारोबार कर रहे हैं. वो खुद आर्थिक रूप से तो मजबूत हो ही रहे हैं, बेरोजगारों के लिए रहनुमा भी साबित हो रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित मिहीपुरवा ब्लॉक में 4 हज़ार की आबादी वाला गांव कुड़वा है जहां सोमवर्धन पांडेय अपने परिवार के साथ रहते हैं. 1999 में लखनऊ विश्विद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त करके नौकरी के पीछे न भागकर कृषि को अपना जीविकोपार्जन का साधन बनाने की ठानी. सोमवर्धन पांडेय ने कहा कि उद्यान विभाग के उद्यान निरीक्षक आरके वर्मा की मदद से 2004-05 में 10 हजार की लागत से 3 बीघे में ग्लैडियोलस की खेती की शुरुआत की, जिसके फूल बहराइच, लखनऊ व प्रदेश के अन्य शहरों में बिकने के लिए भेजे गए. उन्होंने बताया कि इससे मुझे 8 से 10 लाख रुपये की आय हुई थी. जिसकी वजह से मेरा औद्यानिक फसलों और कृषि क्षेत्र में नये-नये प्रयोग करते हुये फूलों की खेती की तरफ रुझान बढ़ा. हमने कृषि में नवीनतम तकनीक को अपनाते हुए फूलों की खेती को मानक बनाया. फूलों की खेती में मैं न सिर्फ मण्डी पर आधारित रहा बल्कि गोण्डा, बलरापुर, बहराइच, लखीमपुर, सीतापुर यहां के फुटकर फूल विक्रेताओं से भी सम्पर्क साधा. यही मेरी सफलता का मूल कारण बना. जिसकी वजह से प्रदेश के फूल उत्पादक कृषकों में मेरा अपना एक स्थान है.

 

सोमवर्धन पांडेय आगे कहते हैं कि कुछ नया करने का जुनून खत्म नहीं हुआ और जापान की एक प्राचीन कला जिसको बोनसाई कहते हैं, उसके ऊपर रिसर्च करना शुरू किया. लगभग साल भर तक उसकी तकनीक पर गहराई से अध्यन करने के बाद उस पर काम करना प्रारम्भ किया. बोन का मतलब प्लेट और साई का मतलब पौधा रिसर्च में निकल कर आया. बड़े वृक्ष को छोटे रूप में प्लेट में ले आते हैं. इस तकनीक के हिसाब से एक पौधे में 8 साल तक का वक्तम लगता है. उन्होंने दवा किया की हमारे पास 40 साल पुराना पेड़ है जिसको हमने छोटा रूप देकर तैयार किया है. देश विदेश से इसकी लगातार डिमांड आ रही है. 5 लाख से अधिक तक देने को लोग तैयार हैं लेकिन हमने बेचा नहीं. वैसे अमूमन पौधे के 5 हज़ार से 12 हज़ार तक मिल जाते हैं. उनका का कहना था कि फूलों के बीज को कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ता है ताकि उसको अगले साल भी इस्तेमाल किया जा सके. आर्थिक हालत पर कहते हैं कि तीन भाइयों के सहयोग से हम 25 बीघे में इसकी खेती कर रहे हैं जिससे मेरा सालाना कारोबार 25 लाख रुपये का है.

 

सोमवर्धन पांडेय सन्देश देते हुये कहते हैं कि शहरों में जिस तेज़ी के साथ आबादी से ऑक्सीजन की कमी हो रही है, अगर बोनसाई को शहरों में किसान पहुंचायेगा तो एक तरफ किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी और शहरों में ऑक्सीजन और सकरात्मक ऊर्जा बढ़ जाएगी. किसान के जेब में पैसा होगा और शहरों में ऑक्सीजन. यही वजह है कि हमने अपने घर को बोन्साई से ऐसा मेंटेन किया है कि जिसको हरियाली कि जन्नत कहा जाता है. उन्होंने शहरों में बिमारियों को रोकने के लिए घरों में एरिका पाम, मनी प्लांट के साथ में इसनेक प्लांट, टंग प्लांट लगाने पर बल दिया और दवा किया किया कि जहां घर में इससे एक ओर ऊर्जा मिलेगी साथ में घर में 90 प्रतिशत बीमारी अपने आप खत्म हो जाएगी. उन्होंने आगे कहा कि अभी एक नई तकनीक बोगन बेलिया पर नया प्रयोग जारी है. साथ-साथ नीबू की सघन बागवानी, विभिन्न प्रकार के पौधों के बोनसाई तैयार करना व गेंदा, गुलाब, ग्लैडियोलस व सीजनल फूलों की खेती की जा रही है.

उन्होंने कहा कि दुनिया मुझे एक बोनसाई मास्टर के रूप में जानती है और मेरी बोनसाई भारत के साथ-साथ दुनिया के हर कोने में ऑन-लाइन मार्केटिंग द्वारा जा रही है. और ऑन-लाइन मार्केटिंग प्रक्रिया के लिए कोई बड़ा स्टाफ नहीं रखा बल्कि खुद अपने घर से संचालित करता हूं. वर्तमान में मेरे द्वारा भोजपत्र, बरगद, पीपल, पाकड़, नीम, गुलर, बोगन बेलिया, फाइकस, पाम, जेड प्लान्ट (गुडलक प्लान्ट) जापानी पौधा आदि के पौधे बोनसाई तैयार किये जा रहें है. प्रति वर्ष मेरे द्वारा 8-10 लाख रुपये के बोनसाई तैयार कर बिक्रय किये जा रहे हैं. शिक्षित बेरोजगार उद्यान विभाग से नर्सरी उत्पादन का प्रषिक्षण प्राप्त कर इसको एक कुटिर उद्योग के रूप में अपना सकते हैं.

बहराइच उद्यान विभाग के उद्यान निरीक्षक आरके वर्मा ने बताया कि सोमवर्धन पांडेय ने देश का नाम पूरी दुनिया में रौशन किया है. आज उनकी कामयाबी और लगन को देखते हुए नौजवान कृषि के क्षेत्र कि तरफ लौट रहे हैं. उनका मानना है कि आज के भौतिक युग में लोगों के घरों में जगह काफी कम हो गयी है. इसलिये वे हमारे भारतीय संस्कृति के पौधे बोनसाई के रूप में लगाकर हरियाली का आनन्द लेने के साथ ही शहरों में प्रदूषित वातावरण में कम स्थान में हम अपनी पवित्र वनस्पति को जीवित रख सकते हैं और पूरे शहर के वातावरण स्वच्छ एवं ऑक्सीजन युक्त कर सकतें हैं.

 

   

 


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