जगत राम की जग प्रसिद्धि, लोग लेते हैं सेल्फी

जहां चाह वहां राह की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं जगत राम। खेती किसानी में ये इतने निपुण हैं कि विदेशी भी इनसे खेती का पाठ सीखने आते हैं। खुद आदिवासियों से सीखकर जड़ों की ओर लौटे जगत राम ने लुप्त बीजों को पुनर्जीवित किया और अपने खेतों को अनूठी प्रयोगशाला में बदल दिया। लोग पहले इन्हें सनकी कहते थे। अब वही लोग इन्हें ज्ञानी राम कहते हैं।

हरियाणा के करनाल जिला निवासी जगतराम ने जब पारंपरिक बीजों से खेती की तो फसलें लहलहा उठीं। दूसरे किसान ये देखकर दंग रह गए। जगत राम के इस काम से हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत सहित देश-विदेश के अनेकों प्रगतिशील किसान काफी प्रभावित हैं। कनाडा, इराक, ईरान और ऑस्ट्रेलिया के किसान प्रयोग करने के लिए इनसे बीज लेकर गए हैं। इनके खेत और बीज बैंक देखकर विदेशी इनके साथ सेल्फी भी लेकर जाते हैं। 

जब दुनिया हाइब्रिड बीज और रासायनिक उर्वरक के पीछे भाग रही है ऐसे में जगत राम ने पारंपरिक खेती का बीड़ा उठाया। वे अपने खेतों में देसी खाद डालते हैं और बिना कीटनाशक का प्रयोग किये खेती करते हैं। लगभग 10 वर्ष पहले उन्होंने पारंपरिक बीजों से खेती की शुरुआत की थी। तब गांव के लोगों ने उनका यह कहकर मजाक उड़ाया था कि इस प्रयास से कुछ नहीं होगा।

जगतराम बताते हैं कि शुरूआत में मुझे इस काम को करने में काफी परेशानी का सामना भी करना पड़ा। एक तो मेरे पास बीज नहीं थे, दूसरा कब और कैसे खेती की जानी है इसका भी ज्ञान नहीं था। ऐसे में मुझे आदिवासियों की सीख काम आई। उन्होंने कहा कि पहले मैंने उनसे बीजों को लिया, जो यहां आसानी से उग सकते थे। वे कहते हैं कि आदिवासी अशिक्षित जरूर हैं, लेकिन प्रकृति के साथ उनका रिश्ता अटूट होता है। उनकी खेती प्रकृति आधारित और पारंपरिक होती है। इसलिए मैंने भी पारंपरित तौर पर खेती का काम करना शुरू किया। शुरुआती परेशानियों के बाद कामयाबी मिलनी शुरू हो गई और उत्पादन भी बढऩा शुरू हुआ। जिसके परिणामस्वरूप बीज की मात्रा बढऩे लगी। तब मैंने बीज बैंक बनाया जिसके अंतर्गत 200 किस्मों के अलग-अलग बीजों को संग्रहित किया। इसमें कुछ बीज तो दुर्लभ श्रेणी के हैं। वे खुद इन बीजों से खेती करते हैं और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं।

जगत राम सर्दियों के मौसम में 50 से 60 किस्मों की सब्जियां उगाते हैं। गर्मियों में 30 किस्मों की सब्जियां पैदा करते हैं। रबी व खरीफ में सात किस्मों के अनाज पैदा करते हैं। छह प्रकार की दाल की पैदावार लेते हैं। उनके पास एक एकड़ का बाग है, जिसमें बब्बू गोसा, पपीता, नासपाती, चीकू, लीची, अनार, विभिन्न प्रकार के आम, अमरूद, नींबू, मौसमी, किन्नू, हींग, खुरमानी, फालसा, अंजीर, सौजना, शहतूत, आलू बुखारा, बादाम, कटहल, सेब, लोकाट व खिरनी को लगाया है।

इसके अलावा उन्होंने मेढ़ पर हरड़, बहेड़ा, आंवला, बेल पत्थर, नीम, ढाक, किकर, बकेन, शीशम, पिलखन व पीपल, एलोवीरा, तुलसी, शतावरी, लैमन ग्रास, इलायची व जामुन इत्यादि के पेड़ों को लगाया है। जगतराम का दावा है कि इस तरह की खेती से 30 प्रतिशत अधिक का लाभ मिलता है। उन्होंने बताया कि रासायनिक उर्वरकों पर जो खर्च होता है, वो इस विधि से समाप्त हो जाता है और एक पैदावार ज्यादा भी होता है। वे अपनी उपज को बाजार के ही भाव में बेचते हैं लेकिन उत्पादन ज्यादा होने से उन्हें मुनाफा भी ज्यादा होता है।

जगतराम की इस विधि को अब हर कोई अपनाने की ओर अग्रसर है। कई किसान उनके इस हुनर को अपना कर खेती कर रहे हैं। सनकी से ज्ञानी बने इस किसान की कहानी निश्चित रूप से सभी को प्रेरित करेगी।  

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