फल-फूल की खेती ने दी नई पहचान

हर कोई उद्यमी नहीं बनना चाहता। उद्यमी वही होता है जो नौकरी की बेड़ियां तोड़ने में सफल होता है। हम आपको एक ऐसे व्यक्ति की कहानी बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी सरकारी नौकरी को छोड़ उद्यमिता की राह पकड़ी। यह कहानी है टिहरी जिले (उत्तराखंड) के जौनपुर ब्लॉक स्थित बसाण गांव के बिरवान सिंह रावत की। 52 वर्षीय बिरवान सिंह वर्तमान में एक ऐसे किसान हैं जिनसे जिले भर के लिए प्रेरणा ले रहे हैं। वह रक्षा मंत्रालय के उपक्रम में उपप्रबंधक तैनात थे। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि पहाड़ के लोग खेती छोड़ नौकरी के लिए महानगरों में भटक रहे हैं। इसिलिए उन्होंने ठान लिया कि क्यों न खुद गांव लौटकर युवाओं की इस पीड़ा को कुछ कम करें।

इसके बाद नौकरी से त्यागपत्र दिया और लौट आए गांव। आज 17 साल की मेहनत से विकसित किया गया आधुनिक उद्यान उनकी जिंदगी को महका रहा है। बिरवान उत्तराखंड में अकेले काश्तकार हैं, जो फलों की पैदावार बढ़ाने को पौधों का क्लोन तैयार करवा रहे हैं। उन्होंने बागवानी के लिए अपने खेतों के अलावा कुछ खेत ग्रामीणों से भी खरीदे हैं जहां आज बड़े पैमाने पर उद्यानिकी का काम किया जा रहा है। उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि वर्ष 2002 से पहले बसाण गांव के लोग धान की खेती करते थे जिसका विशेष लाभ लोगों को नहीं मिलता था। गांव लौटकर मैंने धान में लाभ होता न देखकर अपने खेतों में फलों की पौध लगानी शुरू की और धीरे-धीरे एक खूबसूरत उद्यान तैयार हो गया।

वह अपने खेतों में सेब, कीवी व नाशपाती का उत्पादन करते हैं। जिनकी मांग देहरादून से लेकर दिल्ली, मुंबई और अहमदाबाद की मंडियों तक है। बहुत से खरीदार स्वयं उनके उद्यान में पहुंच जाते हैं। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में वे करीब दो लाख रुपये के सेब व कीवी बेच चुके हैं। इसके अलावा वे फूलों की खेती भी कर रहे हैं जिसका लाभ भी उन्हें मिल रहा है।

अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. सिडार के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने क्लोन से तैयार पेड़ों के इस आधुनिक उद्यान का दौरा भी किया। टीम ने यहां उत्पादित फलों के बारे में जानकारी भी जुटाई। कई वैज्ञानिकों ने बिरवान सिंह रावत के इस काम की प्रसंशा भी किया।

बिरवान बताते हैं कि उनकी बेटी शिवाली देहरादून में बीएएमएस और बेटा हिमांशु दिल्ली में पर्यावरण विज्ञान में एमएससी कर रहा है। दोनों छुट्टियों में घर लौटने पर उनकी मदद करते हैं। सीजन में वे लगभग 15 लोगों को रोजगार देते हैं, जबकि पांच लोग नियमित रूप से उनके यहां रोजगार कर रहे हैं।

दरअसल क्लोन के लिए किसी पेड़ के तने या ऊपरी हिस्से की कोशिका को प्रयोगशाला में मिट्टी के 16 पोषक तत्वों की टेस्ट टयूब में डाला जाता है। पोषक तत्वों और उचित तापमान की मदद से वह कोशिका कुछ महीने बाद अंकुरित होकर पौधा बन जाती है। इस प्रक्रिया में छह महीने का समय लगता है। इसके बाद उसे जमीन में रोपा जाता है। इसी प्रक्रिया को सामान्य भाषा में क्लोन की संज्ञा दी गई है।

क्लोन पौधे को लगाने के बाद उसकी जड़ों से अन्य पौधे विकसित होते हैं, जिन्हें बगीचों या खेतों  में रोपा जाता है। इन पौधों की खासियत यह होती है कि वह तीन साल में ही फल देने लगते हैं। जल्दी फल देने के कारण किसानों की आय भी बढ़ती है। इसी कारण काश्तकारों में क्लोन पौधे का क्रेज काफी बढ़ रहा है। क्लोन पेड़ 15 साल तक अपनी जड़ों से छोटे-छोटे पौधों को जन्म देता है।

बिरवान सिंह रावत नौकरी कर रहे होते तो शायद गिने-चुने लोग ही उन्हें जानते लेकिन उनके इस काम से जिले भर के लोगों में उनका नाम प्रसिद्ध हो गया है। हो न हो एक बात को अवश्य है कि अनेकों किसान बिरवान सिंह रावत से प्रेरणा ले रहे हैं।

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