सामूहिक प्रयास से हुआ पनामा विल्ट का सफाया

केले की खेती भारतवर्ष में नकदी फसल के तौर पर की जाती है इसलिये अधिक लाभ कमाने के लिये किसान काफी लागत लगाते हैं ताकि वे अच्छा मुनाफा कमा सके, लेकिन पनामा विल्ट ने किसानों की कमर तोड़ रखी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में केले में पनामा रोग ने केवल किसानों को सचेत ही नहीं किया बल्कि वैज्ञानिकों को भी नैदानिक शोध के लिये प्रेरित किया। सोहावल, उत्तर प्रदेश में सबसे पहले पनामा बीमारी को लगभग दो साल पहले देखा गया था और वहां के किसानों ने सर्वप्रथम इस बीमारी से निपटने के लिये किसान सहायता की गुहार भी लगायी थी। रसायनिक दवाओं के प्रयोग के बाद भी इस बीमारी को रोकने में असफलता ही मिली है। आखिरकार सोहावल के किसानों ने थक हारकर देश-विदेश में केले की खेती कर रहे अनुभवी लोगों से संपर्क साधा और उनके द्वारा सुझाए गए तरीकों को अपनाकर केले की फसल को बचाने का प्रयास किया। अधिकतर विशेषज्ञ समझने में असमर्थ थे कि आखिर यह बीमारी है क्या। कई अन्य बीमारियों से मिलते जुलते लक्षणों के कारण पनामा विल्ट को पहचानने में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

पनामा विल्ट बीमारी ने ताईवान, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका एवं आस्ट्रेलिया में करोड़ो रूपये की क्षति पहुंचाई जबकि भारत में इसका असर कम रहा। दरअसल यह बीमारी भारत में लगभग तीन वर्ष पूर्व ही दर्ज की गयी थी। इससे पहले ऐसा समझा जाता था कि केले की खेती पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन बिहार में इस बीमारी ने इतनी भयावह रूप ले लिया कि समूचा केले का बाग ही नष्ट हो रहा है। अधिक संक्रमण की स्थिति में केले की उपज में 80-90 प्रतिशत तक की हानि होती है।

इस बीमारी पर नियंत्रण न हो पाने के कारण किसानों में हताशा फैल गयी। इसी दौरान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, लखनऊ स्थित केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डा. दामोदरन एवं केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के वैज्ञानिकों की एक टीम बनाकर निदेशक, डा. शैलेन्द्र राजन ने किसानों को इस समस्या से निदान दिलाने के लिये भरकस प्रयास किये। चूंकि यह बीमारी एक खेत से दूसरे खेत में सिंचाई के पानी, साइकिल, गाड़ियों के टायर, जूते में लगी मिट्टी, फावड़े-कूदाल और कई कारणों से एक खेत से दुसरे में फैलती हैं। इसको रोकने के लिये सबकी भागीदारी आवश्यक समझी गई, इसको रोकने के लिए किसानों ने सामूहिक प्रयास किया। सोहावल में केला उत्पादकों को संगठित करके “उत्तर प्रदेश केला उत्पादक संघ” बनाकर, जागरूकता कार्यक्रम चलाया गया ताकि बीमारी के बारे में लोगों का ज्ञान बढ़े और इसके नियंत्रण में सफलता प्राप्त की जा सके।

आईसीएआर द्वारा विकसित आईसीएआर- फ्यूजीकांट दवा से बीमारी को रोकने में काफी सफलता मिली। फ्यूजीकांट का उपयोग करने में किसानों ने काफी योगदान दिया और उनसे मिलने वाली प्रतिक्रिया एवं सलाह के आधार पर इस तकनीकी में सुधार करने में वैज्ञानिकों को भी सफलता मिली। इस तरह वैज्ञानिकों एवं किसानों के सहयोग से इस भयानक बीमारी को सफलतापूर्वक नियंत्रण करने में सफलता मिली जोकि विश्व हेतु एक अनूठा उदाहरण है।

आईसीएआर- फ्यूजीकांट उत्तर प्रदेश के सोहावल के लिए ही नहीं बल्कि बिहार में भी कारगर सिद्ध हुई। सोहावल की तर्ज पर बिहार में भी केला उत्पादकों के सामुहिक प्रयास से विल्ट का नियंत्रण किया जा रहा है। वर्तमान में अधिक मात्रा में आईसीएआर- फ्यूजीकांट को बनाने की सुविधा उपलब्ध नहीं है और आगामी एक या दो माह में सुविधा उपलब्ध होने पर इसे किसानों को अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध कराया जायेगा। सोहावल की देखा देखी संत कबीर नगर, मेदावल और सिसवा बाजार के किसानों ने भी भारतीय अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों के सहयोग के लिये निवेदन किया है। माटी फाउंडेशन नामक सामुदायिक संगठन के साथ सहयोग करके इस क्षेत्र में इस बीमारी पर नियंत्रण प्राप्त करने का प्रयास प्रारंभ कर दिया गया है। इस दिशा में किये गये प्रयासों में काफी सफलता मिली है जो केवल वैज्ञानिकों एवं किसानों के आपसी तालमेल के कारण संभव हो पाया है।

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