आलू की खेती से किसानों की आय में होगा इजाफ़ा: डॉ. मनोज कुमार

देश में कृषि क्षेत्र विकसित होता जा रहा है, लेकिन अभी भी कृषि क्षेत्र को और अधिक विकसित करने की आवश्यकता है। सरकारी कृषि संस्थान इसके लिए लगातार प्रयासरत है ताकि किसानों की आय बढ़ाई जा सके। कुछ ऐसी फसलें है जिनकी सहायता से किसानों की आय में इजाफ़ा किया जा सकता है। आलू भारत की मुख्य सब्जियों में से एक है। बड़े स्तर पर भारत में आलू की खपत होती है और उसी के हिसाब से भारत में आलू का उत्पादन भी होता है। हालांकि आलू को ठंडे प्रदेशों की फसल थी, लेकिन अब इसको मैदानी क्षेत्रो में भी उगाया जाने लगा है। इसके पीछे केन्द्रीय आलू अनुसन्धान संस्थान का बड़ा योगदान रहा है। इसी के विषय में फसल क्रांति की टीम ने संस्थान के मेरठ स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के संयुक्त निदेशक डॉ. मनोज कुमार से बात की।  

केन्द्रीय आलू अनुसन्धान संस्थान कैसे काम करता है?

केन्द्रीय आलू अनुसन्धान संस्थान एक विश्व स्तरीय संस्थान है। हम मुख्य रूप से आलू की नई प्रजातियों को विकसित करने के लिए अनुसन्धान करते हैं। इसी को लेकर हम किसानों के लिए सतत कार्य कर रहे हैं, ताकि आलू की बेहतर किस्में देश के किसानों को प्रदान की जा सके। इसमें हमारे संस्थान सबसे महत्वपूर्ण योगदान है कि संस्थान के वैज्ञानिकों के प्रयास से ऐसी आलू की किस्में विकसित हुई जो मैदानी भागों में भी उगाई जा सकती है। उसी का परिणाम है कि अब देशभर में आसानी से मैदानी इलाकों में आलू खेती कर रहे हैं।

अभी तक संस्थान की क्या-क्या उपलब्धियां रही हैं ?

यदि हम संस्थान की उपलब्धियों की बात करें तो आलू की किस्म को सबट्रॉपिकलाईज करने में हमारा संस्थान लीडर है। हमारा संस्थान ने आलू की ब्रीडिंग करके अब तक 65 किस्में ईजाद कर चुका है। भारत के अलग-अलग प्रदेशों के लिए अलग-अलग किस्में हमने विकसित की हैं। संस्थान ने देश में आलू का उत्पादन बढाने में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सीपीआरआई ने अब तक कितने प्रकार की आलू की किस्में विकसित की है?

यदि संस्थान द्वारा विकसित की गई आलू की किस्मों की बात करें तो संस्थान ने अधिक उत्पादन देने वाली किस्में, रोग प्रतिरोधक किस्में और अलग प्रदेशों के क्लाइमेट जोन में उगने वाली किस्में विकसित की है। संस्थान द्वारा विकसित कुफरी मोहन अधिक उत्पादन देने वाली आलू की किस्म है। इसके अलावा वाणिज्यिक उद्देश्य से खासकर प्रसंस्करण की जाने वाली किस्में जैसे चिप्स के लिए चिप्सोना 1, चिप्सोना 3, चिप्सोना 4 जैसी आलू की किस्में हमने विकसित की हैं।

अनुसन्धान के अलावा संस्थान और क्या कार्य कर रहा है?

संस्थान का मुख्य कार्य अनुसन्धान करके नई किस्मों को विकसित करना है, लेकिन हमारा संस्थान अनुसन्धान के अलावा फसल प्रबंधन, जलप्रबंधन, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा भण्डारण के लिए तकनीक विकसित करने में भी काफी काम किया है। जिसका फायदा देश विदेश तक किसानों को मिल रहा है। बीज विकसित करने और उसका भण्डारण करने में संस्थान ने बहुत ही उत्कृष्ट काम किया है। मैं मानता हूं कि एशिया में जितने भी देश है भारत आलू की किस्म को विकसित करने में बहुत बढ़िया काम कर रहा है। इसके अलावा पिछले 5 सालों में हमने टिश्यू कल्चर यानी एरोपोनिक्स तकनीक को भी इंटीग्रेट किया है। इसे बीज उत्पादन तकनीक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे बीज उत्पादन में क्रांति आ गयी है। देश में इस तकनीक का इस्तेमाल 18-20 निजी कंपनियां कर रही है और किसानों को अच्छी किस्म के बीज उपलब्ध करा रही है। 

बायोफोर्टीफिकेशन के लिए संस्थान की ओर से क्या कदम उठाये जा रहे हैं?

इसके लिए हमारे दो पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जिसमें एक प्रोजेक्ट में माइक्रोन्युत्रियेंट किस्मों पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा हम एंटीओक्सिडेंट रिच किस्मों पर भी काम कर रहे हैं। संस्थान ऐसी दो किस्में विकसित कर चुका है जो कि बायोफोर्टीफाईड है। इसमें एक कुफरी नीलकंठ है और दूसरी किस्म है कुफरी माणिक। ये दोनों किस्म एंटीओक्सिडेंट और न्यूट्रीशन युक्त और सुपीरियर किस्म हैं। आगे भी हम इसी तरह की आलू की किस्में विकसित करने पर काम कर रहे हैं। अभी तक संस्थान का उद्देश्य आलू का उतपादन बढ़ाना था, जिसमें हम पूरी तरह सफल हुए हैं। अब संस्थान का उद्देश्य ऐसी किस्में विकसित करना है जिससे की सभी पोषक तत्व फसल के अन्दर ही मिल सके।

किसानों की आय दोगुनी करने में संस्थान का क्या योगदान है?

जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री का विज़न है किसानों की आय दोगुना करना इसी के तहत संस्थान बहुत पहले से काम कर रहा है। संस्थान द्वारा विकसित आलू की किस्मों से किसान अधिक उत्पादन ले रहे हैं। इस के साथ ही हमने किसानों को आलू की ऐसी किस्में भी दी है जो कि रोगों से लड़ने में सक्षम है। अगर किसानों को उनके उत्पाद का सही दाम मिले तो किसानो की आय निश्चित तौर पर बढ़ेगी। अभी तक हम उत्पादन का सिर्फ 1 प्रतिशत ही निर्यात कर रहे है। निर्यात को बढाने के लिए सरकार और संस्थान प्रयास कर रही है। इसी के सन्दर्भ में हमने एपीडा से भी बात की है। उम्मीद है की आलू का निर्यात जरुर बढ़ेगा।

किसानों को क्या कहना चाहेंगे?

किसानों को मैं बस इतना कहना चाहूँगा कि वो आलू की खेती तकनीकी तरीके से करें ताकि उनको अच्छी फसल मिले। जिससे की लागत कम लगे और अच्छा उत्पादन मिले। किसान आलू की खेती से अपनी आय बढ़ा सकते है। इसलिए अन्य फसलों के साथ किसान आलू की खेती भी अवश्य करें।  

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