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किसानों को नई राह दिखाते हैं पद्मश्री कँवल सिंह चौहान

Last Updated: August 30, 2019 (02:24 IST)

कँवल सिंह चौहान हरियाणा सोनीपत जिले के उटेरना गांव के एक ऐसे प्रगतिशील किसान हैं जो बेबीकॉर्न की खेती कर लाखों रूपया कमाते हैं साथ ही किसानों को नई राह दिखाते हैं। हरियाणा में उनकी काफी लोकप्रियता है। खेती में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए उन्हें पद्मश्री अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है। राज्य के कई गावों किसान उनसे प्रेरित होकर बेबीकॉर्न की खेती कर रहे हैं।

कँवल सिंह चौहान से बातचीत करने के लिए फसल क्रांति की टीम ने उनसे मुलाकात की जिसमें उन्होंने खुलकर बेबीकॉर्न की खेती करने के बारे में बताया।

आपने खेती कब शुरू की और किन फसलों से शुरूआत की?

मैंने वर्ष 1978 में खेती करने का काम शुरू किया। पहले मैं धान की खेती करना शुरू किया लेकिन धान की खेती में उतना लाभ नहीं मिला। खेती के चक्कर में मेरे सर पर साहूकारों का कर्ज चढ़ गया। कर्ज को उतारने के लिए मैंने तरह-तरह के कामों को भी किया लेकिन उसमें भी उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। मैनें वर्ष 1984 में डेयरी फार्मिंग शुरू की, साथ ही जैविक खेती का काम भी शुरू किया। बायो गैस प्लांट लगाया ताकि जैविक खाद की उपलब्धता हो सके। मैनें बासमती धान की खेती भी की।

बासमती खेती से बेबीकॉर्न की खेती तक की सफर को कैसे देखते हैं ?

बासमती से बेबीकॉर्न तक का सफर शानदार रहा। चूँकी बासमती धान की कीमत अन्य धान की किस्मों से अधिक होती है इसलिए मैंने बासमती धान भी लगाया ताकि अधिक मार्जिन मिल सके। ये सब करते-करते 20 वर्ष का लंबा समय बीत गया लेकिन मुझे सफलता नहीं मिली। वर्ष 1998 में सर्वप्रथम मुझे बेबीकॉर्न की खेती के बारे में पता चला कि बेबीकॉर्न की खेती से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। मैं बेबीकॉर्न की खेती के बारे में जानकर उत्सुक हुआ और वर्ष 1998 के अगस्त माह में बेबीकॉर्न की खेती करना शुरू कर दिया। तब मुझे बेबीकॉर्न से ज्यादा लाभ होने लगा। पहले मैंने बेबीकॉर्न को एक एकड़ में लगाया था लेकिन लाभ मिलता देख मैंने इसे 4 एकड़ खेत में लगाया। जिससे मुझे बहुत फायदा हुआ। इस तरह हमारा काम चलते लगा।

आपको देखकर अन्य किसानों की क्या प्रतिक्रिया रही?

वर्ष 2000 तक पूरे गांव में मैं ही बेबीकॉर्न की खेती अकेले करता था। मुनाफा होता देख मेरे पड़ोसी किसानों ने भी बेबीकॉर्न की खेती करनी शुरू कर दी। इस तरह देखा देखी गांव भर के किसान इसकी खेती करने लगे। आलम यह हुआ कि देश विदेश के वैज्ञानिक, शोधकर्ता, पूसा संस्थान के विद्यार्थी इत्यादि हमारे गांव आकर बेबीकॉर्न की फसलों का निरीक्षण करने लगे और उचित सलाह देने लगे जिसके कारण हमारी उत्पादकता और मुनाफा दोनों बढ़ने लगा। इस तरह मुझे और अन्य किसानों को इससे लाभ मिलने लगा। अब तो 20-25 गावों के किसान इसकी खेती करने लगे हैं।

बेबीकॉर्न की खेती मार्केटिंग कैसे करते हैं।

बेबीकॉर्न की मांग इतनी ज्यादा है कि इसकी मार्कटिंग आसानी से हो जाती है। किसानों से मैं ही उचित मूल्य पर खरीदता हूं। ज्यादातर किसान मुझे ही बेबीकॉर्न बेचते हैं। इसके अलावा आजादपुर मंडी में भी बिकता है। मैं गर्व से कह सकता हूं कि यहां से बेबीकॉर्न इंग्लैण्ड तक जा रहा है। वर्ष 2009 में हमने पहला बेबीकॉर्न प्रोसेसिंग प्लांट लगाया जिसका उद्धाटन 5 फरवरी 2009 को नार्वे के कृषि मंत्री पैडक ब्रैक ने किया।

आपके पास कितने बेबीकॉर्न प्रोसेसिंग प्लांट हैं?

हमारे पास 5 बेबीकॉर्न प्रोसेसिंग प्लांट हैं। पहला वर्ष 2009 में शुरू हुआ। 2012 में कोऑपरेटिव सोसायटी बनाकर मैंने दूसरी यूनिट शुरू किया। तीसरा प्लांट मैंने सरकार से जमीन लेकर राई में लगाया और चौथा प्लांट मैंने ओटेरना गांव में लगाया है जिसमें बेबीकॉर्न, स्वीटकोर्न और मटर का प्रोसेसिंग हो रहा है। पांचवीं प्लांट भी प्रोसेस में है।   

क्या बेबीकॉर्न को पशु चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है?  

जी हां, बेबीकॉर्न की पत्तियों को पशु चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसको खिलाने से पशु स्वस्थ होते हैं और उनकी दूध क्षमता बढ़ जाती है। अगर किसी दूधारू पशु को बेबीकॉर्न को खिलाया जाए तो दो दिन में ही दूध 2 से ढाई किलो बढ़ जाता है। ये किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है। बेबीकॉर्न की खेती करने का एक और फायदा है कि वर्ष भर पशुओं को हरा चारा मिल जाता है। इस तरह किसान और पशु दोनों खुशहाल रहते हैं।

पद्मश्री अवॉर्ड किसी किसान को मिलना, इसे किस तरह देखते हैं?

पद्मश्री अवॉर्ड का मिलना मुझे और मेरे क्षेत्र के किसानों के लिए गौरव की बात है।  मुझे अलग-अलग क्षेत्र में सम्मानित किया गया। किसी किसान को यह सम्मान मिलना बड़े गर्व की बात है। पद्मश्री अवॉर्ड मुझे 16 मार्च 2019 को प्रदान किया गया। इसके लिए मैं भारत सरकार का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे जैसे किसान की पहचान की और इस सम्मान से नवाजा। मुझे यह सम्मान इसलिए दिया गया क्योंकि मेरे नक्शेकदम पर चलकर हमारे जिले के किसान समृद्ध हुए हैं। लगभग 5000 लोगों को इससे रोजगार मिला है। यहां से 1.5 टन बेबीकॉर्न प्रतिदिन हवाई मार्ग से इंग्लैंण्ड जा रहा है जिससे विदेशी मुद्रा अर्जित हो रही है। ये भारतीय अर्थव्यवस्था में अपना अमूल्य योगदान दे रहा है।  


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