कोरोना महामारी और भारतीय कृषि: एक विश्लेषण

कोरोना महामारी से चल रहे स्वास्थ्य संकट ने जीवन के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। खुदरा बाजार से लेकर शापिंग मॉल तक और कुटीर उद्योगों से लेकर बड़े उद्योग, सब पर घातक प्रभाव पड़ा है। स्थिति में देश का कृषि क्षेत्र भी अछूता नहीं रह सकता। ये किसानों की ख़ुशनसीबी हीं थी कि भारत में तालाबंदी (lockdown) ऐसे वक़्त में लगा, जब खेतों में रबी की फसल खड़ी थी और कटाई का समय आ चुका थाI मानसून की लम्बी सक्रियता, भूमि में आधी नमी एवं जलाशयों में भरपूर पानी होने के कारण इस वर्ष रबी की फसलों का बम्पर उत्पादन होने का अनुमान लगाया गया था और हुआ भी लेकिन कोरोना महामारी और उसकी रोकथाम के लिए लगा हुआ देशव्यापी तालाबंदी ने गेहूं, सरसों, चना, मसूर और अन्य रबी फसलों की कटाई करने वाले किसानों की सारी उम्मीदों को धराशायी कर दियाI इस तालाबंदी की वजह से खेतिहर मजदूरों, ठेके पर आने वाले प्रवासी मजदूरों और हार्वेस्टर, थ्रेशर, ट्रैक्टर, ट्रकों और दूसरे उपकरणों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई, तथा रबी की फसलों की कटाई पर संकट के बादल मंडराने लगे। देश के विभिन्न जगहों से यह भी खबर आई कि किसानों ने सड़ने वाली फसलों, विशेष रूप से फल और सब्जियों, को जनता में बाँट दिया या फिर उसकी जुताई कर दी। इसका मुख्य कारण था कि फल और सब्जियाँ खेत से निकल नहीं पा रहीं थी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में इनके भंडारण के लिए भी कोई इन्तजाम नहीं था। जिसके कारण सब्जी व फलों के दाम काफी तेजी से गिरे। कुछ राज्यों में सरसों, मटर, चना, प्याज़, आलू आदि फ़सलों की आवक बाज़ार में शुरू हो चुकी थी। परन्तु कोरोना महामारी से बाज़ार में एक नकारात्मकता फैल गई, जिसके कारण फसलों के दाम सरकार द्वारा तय की गयी न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) से भी नीचे आ गया है। जैसे, चने और सरसों के दाम बाज़ार में समर्थन मूल्य से क्रमशः 1225 एवं 825 रुपये प्रति कुंतल नीचे गिर गएI कपास की कीमत भी मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य से 1000 रुपए प्रति कुंतल तक नीचे चल रही है। इसका सबसे बड़ा कारण विश्व के कोरोना वायरस के संक्रमण को बढ़ने से रोकने के लिए लगाए गए तालाबंदी (lockdown) के कारण सभी देशों का आपसी आयात-निर्यात का बहुत कम होना है, जिस कारण भारतीय कृषि बुरी तरह प्रभावित हुई है। हमारे देश में उत्पन्न होने वाली विभिन्न फसलें जैसे चावल, कपास, रबर, मांस, चायपत्ती, सोयाबीन, सरसों व अन्य तिलहनी फ़सलों के साथ-साथ अन्य कृषि जिंसों के निर्यात पर भी प्रभाव पड़ा और इनके दाम गिर गए; तथा देश के सब्जी, फल, दूध, मुर्गीपालक, मत्स्यपालक, मधुमक्खी किसान भयानक आर्थिक चुनौतियों से लड़ रहे हैं। हालांकि कोरोना वायरस की महामारी आने से पहले से ही भारत में किसानों के हालात बहुतखराब थी, और इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी आमदनी बहुत कम होना हैI साल 2016-17 में भारत के ग्रामीण बैंकिंग की नियामक एजेंसी नाबार्ड की तरफ़ से कराए गए अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेशन सर्वेक्षण में यह पाया गया था कि किसान परिवारों की औसत मासिक आमदनी 8931 (रुपए है तथा इसका तकरीबन 50 फ़ीसदी हिस्सा मज़दूरी और सरकार के कार्य या अन्य कार्यों से आता हैI

राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की घोषणा के तुरंत बाद भारतीय वित्त मंत्री ने 1.7 ट्रिलियन रुपये के पैकेज का ऐलान कोरोना महामारी से होने वाले किसी भी प्रतिकूल प्रभाव से किसानों एवं अन्य कमजोर वर्गों को बचाने के लिए कियाI प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत आय समर्थन के रूप में किसानों के बैंक खातों में 2000 रुपये की अग्रिम राशि भी दी गई थी। सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी मजदूरी गारंटी योजना (मनरेगा)के तहत लगे श्रमिकों के लिए मजदूरी दर 182 से बढ़ाकर 202 रुपये कर दी। कमजोर आबादी की देखभाल करने के लिए विशेष योजना के तहत प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना की भी घोषणा की गई। पंजीकृत लाभार्थियों को अतिरिक्त अनाज आवंटन भी अगले तीन महीनों के लिए घोषित किया गया था। अनौपचारिक क्षेत्र में लगे व्यक्तियों, ज्यादातर प्रवासी मजदूरों, के लिए नकद और भोजन सहायता की भी घोषणा की गईI जिसके लिए अलग से पीएम-केयर्स निधि (प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और आपातकालीन स्थिति में राहत कोष) का निर्माण किया गयाI भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने तालाबंदी अवधि के दौरान किसानों के लिए राज्यवार दिशा-निर्देश जारी किए। सलाहकारों ने विभिन्न रबी फसलों की कटाई और थ्रेशिंग के साथ-साथ फसल उत्पादन के बाद के भंडारण और विपणन के लिए विशिष्ट प्रथाओं का उल्लेख किया। भारतीय रिज़र्व बैंक ने कोरोनामहामारी के कारण "ऋण सेवा के बोझ" को दूर करने वाले विशिष्ट उपायों की भी घोषणा की। सरकार द्वारा कृषि एवं फसल ऋण की अदायगी पर तीन महीने (31 मई तक) की रोक लगा दी गई, और साथ ही साथ में अच्छा पुनर्भुगतान करने वाले उधारकर्ताओं को बैंकिंग संस्थानों द्वारा 300000 रुपये तक के फसल ऋणों के ब्याज दर पर 3 प्रतिशत की रियायत दी गईI

तालाबंदी से हुए आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री जी ने किसानों का देश में योगदान का उल्लेख करते हुए काफी सारे पैकेज एवं योजनाओं की घोषणाकी और इससे 12 करोड़ किसान परिवारों को लाभ मिलने की भी बात कहीI लेकिन विडम्बना यह है कि इसकी पहुंच अब तक कितने किसान परिवारों को है इसका पता भी नहीं चल पाया। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड सहित अन्य राज्यों के किसान अब भी इसके इंतजार में बैठे हुए हैं। इस संकट के समय में किसानों के सामने खड़े आर्थिक संकट व नुकसान की भरपाई हेतु कोई रास्ता नहीं है, जिससे देश के करोड़ों किसान मायूसी व निराशा में हैं।

किसान एक ऐसा कर्मयोद्धा है, जिसके दम पर आज भारत कोरोना जैसी महामारी से लड़ रहा है। देश में अगर अन्न के भंडारण न होते तो कोरोना वायरस से ज्यादा भूख से मौतें होती।परंतु, देश के पास आज एक साल तक का अग्रिम भंडारण लगभग 87 मिलियन टन अनाज के रूप में जमा है।जिन किसानों के दम पर इस खाद्य सुरक्षा को हासिल करने का दम भरते हैं, लेकिन, आज उन किसानोंका जिक्र तक नहीं करते। जहाँ पूरी दुनिया महामारी से डरकर पंगु बनी घर में बैठी है और वहीं किसान जान हथेली पर रखकर देश के लिए अन्न उत्पादन करदेश के भण्डारण को भरने में लगे हुए हैंI आज उन किसानों को समय और बाजार की मर्जी पर छोड दिया गया है।अच्छी पैदावार के बावजूद खाद्य पदार्थों की वितरण व्यवस्था बाधित हो रही है, जिसकेचलते किसानों को सही दाम नहीं मिल पा रहा हैI व्यापार और परिवहन एक सिक्के के दो पहलू हैं और किसी एक के बिना भी दूसरे की कल्पना नहीं हो सकती है। तालाबंदी के दौरान सरकार द्वारा आवश्यक सेवाओं को ज़ारी रखने का आदेश दिया गया हैIकृषि गतिविधियों में छूट के बावजूद भी जिस तरह से छन-छनकर खबरें आ रही है कि ट्रांसपोर्टर और किसानों को पुलिस की हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है।बड़े पैमाने पर आवश्यक खाद्य सामग्री ढो रहे वाहनों को भी बेवजह रोका जा रहा है तथा गृह मंत्रालय के आदेश के बावजूद भी किसानों को पास के नाम पर जुर्माना लगाया जा रहा है। वाहन चालक और उनके सहयोगी कर्मचारियों को ढाबे आदि भी बंद होने की वजह से भोजन एवं पानी की किल्लत हो रही है। ऐसे में चालक और उनके सहयोगी कर्मचारी कैसे अपना काम आसानी से कर सकते हैं, जिसकी वजह से वे लोग वाहनों को लेकर चलने से मना कर रहे हैं। इन सब परिस्थितियों के कारण हर एक राज्य की सीमाओं पर खाद्य सामग्री से लादे हुए वाहनों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। इस समय देश में अन्न की आपूर्ति का नहीं, बल्कि मांग का संकट है। आपूर्ति बाधित और मांग कम होने के कारण किसान स्तर पर खाद्य पदार्थों की कीमतें भी गिरने लगी हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है। होटल, भोजनालय, मंदिर आदि के बंद होने तथा शादियों व अन्य समारोहों के स्थगन के कारण फल, सब्ज़ियों, मसालों, गेहूँ, चावल, दूध आदि खाद्य पदार्थों के साथ अन्य कृषि उत्पादों की मांग मेंभी तेजी से कमी आई है।

ऑनलाइन होम डिलीवरी करने वाले उद्यमों की भी शिकायत है कि उनके गोदामों को बंद करवा दिया गया है तथा उनके कर्मचारियों को होम डिलीवरी करते वक्त जगह-जगह पर दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है, जिसकी वजह से कृषि एवं अन्य उत्पाद का विक्रय नहीं हो पा रहा। इसका असर अंत में किसानों पर ही पड़ा, क्योंकि उनके कृषि उत्पाद उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचे। ऐसी अनेक बाधाओं और बाज़ारों के बंद होने के कारण, कृषि उत्पादों की आपूर्ति ना होने से, इनकी मांग गिरीतथा दाम घट लगेI अगर समय रहते सरकार द्वारा वितरण व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो इसके भयंकर दुष्परिणाम होंगे, जिसका खामियाज़ा सरकार एवं किसान वर्ग दोनों को भुगतना पड़ेगा।

कोरोना महामारी को भारत की पहली ऐसी प्राकृतिक आपदा के रूप में दर्ज किया जायेगा, जहाँ पर खाद्य पदार्थों के उपभोग के स्तर में गिरावट आई, लेकिन देश में भुखमरी की अवस्था पैदा नहीं हुईI क्योंकि देश में महामारी के चलते अफवाहों व कालाबाजारी से भी खाद्य पदार्थों की कीमत में भारी वृद्धि दर्ज नहीं हुई औरइस बार खाद्य संकट उत्पन्न नहीं हुआ। आज देश की मुख्य समस्या खाद्यपदार्थोंकी आपूर्ति की तुलना में मांग की कमी है। जिसकी वजह से इस महामारी और तालाबंदी का देशव्यापी प्रभाव जरुर पड़ा तथा देश में आर्थिक गिरावट दर्ज हुआ।

इसके साथ ही कुछ हिस्सों से अपने मूल स्थानों पर श्रमिकों के प्रवासन ने बहुत ही डरावनी स्थिति पैदा कर दिया है, क्योंकि भारत में 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। इन लोगों के पलायन का मुख्य कारण छोटे-मोटे जगहों पर काम करने वाले लोगों की आमदनी का घटना, काम बंद होना, नौकरी ख़त्म हो जाना या मज़दूरों को काम ना मिलना हैI अब ये लोग शहरों से गांवों की तरफ अपनी रोजी-रोटी के तलाश में पलायन कर रहे हैं, जिसकी वजह से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ने लगा हैI ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले बाहर के मज़दूर भी बीमारी के डर से पलायन कर रहे हैं और इस कारण से गन्ने की छोल और अन्य रबी फ़सलों की कटाई इत्यादि प्रभावित हुई।

फिर भी इस आपदा के असली अदृश्य योद्धा किसान ही हैं, क्योंकि सरकार द्वारा चलायी जा रही सार्वजनिक वितरण प्रणाली, डिटेंशन सेंटर, सामुदायिक रसोई में भोजन वितरण इत्यादि बिना किसानों के संभव नहीं हैI लेकिन किसान आज भी देश के लिए, अग्रिम पंक्ति कोरोना योद्धा नामित हुए बिना भी, खाद्य की अबाधित आपूर्ति कर रहे हैं। किसान सच्चे कर्मयोद्धा हैं जो उत्पादन को बारिश, सूखा, बाढ़ तमाम विपरित परिस्थितियों में भी जारी रखते हैं।

 

आद्यांत कुमार, विशाल वाल्मिक धोते एवं श्रीकांत पुरुषोत्तम बडोले
कृषि ग्रामीण एवं आदिवासी विकास संकाय,
रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थान, मोराबादी, रांची, झारखंड– 834008

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