मई माह के कृषि कार्य

मई का महीना अपेक्षाकृत काफी गर्म रहता है। अतः किसान भाई अपना, अपने परिवार, पशुओं और खेत में खड़ी फसलों को सूर्य की तेज गर्मी से बचाने का विशेष ध्यान रखें। मई के महीने में किये जाने वाले प्रमुख कार्यों में धान की नर्सरी तैयार करना, मृदा परीक्षण, कपास की बुवाई, अनाज भंडारण व ग्रीष्मकालीन फसलों की देखभाल सम्मिलित हैं। इसके अलावा फसल चक्र भी इसी समय निश्चित किये जाते हैं कि किस खेत में कौन-कौन से फसलें उगानी हैं। मई माह में किये जाने वाले कृषि कार्यों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है।

मृदा परीक्षण: किसान भाईयों को 3-4 वर्ष में एक बार अपने खेतों का मृदा परीक्षण अवष्य करा लेना चाहिए। इससे मृदा स्वास्थ्य और उर्वरा शक्ति में संतुलन बनाये रखने में मदद मिलेगी। साथ ही उर्वरकों के अनावश्यक प्रयोग पर भी रोक लगेगी। मृदा नमूने हमेशा रबी या खरीफ फसलों की कटाई उपरान्त लेना चाहिए। मिट्टी का नमूना लेकर अपने नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि अनुसंधान केन्द्रों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, कृभको व इफको इत्यादि के मृदा परीक्षण केन्द्रों में भेज दें। मृदा परीक्षण से यह पता लग जाता है कि किसी विशेष खेत की मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में और किन-किन पोषक तत्वों की कमी है। पोषक तत्वों के साथ-साथ मृदा की भौतिक, रासायनिक और जैविक दशा का भी ज्ञान हो जाता है। इसके अलावा खेत की अम्लीयता व क्षारीयता का भी पता चल जाता है। नमूना लेने के लिए सम्पूर्ण खेत को छोटे-छोटे भागों में बांट लेते हैं। इसके बाद खुर्पी या फावड़े की मदद से ‘वी’ के आकार का 15 से.मी. गहरा गढ्ढा बनाकर मिट्टी का नमूना लें। कई स्थानों से मृदा नमूना लेकर सबको एक साथ अच्छी तरह से मिलायें। इसके बाद सम्पूर्ण नमूने को दो बराबर भागों में बांट लें। एक नमूने को लेकर उसे फिर दो बराबर भागों में बांट लें। इस प्रक्रिया को तब तक दोहराते रहें जब तक नमूने की मात्रा आधा कि.ग्रा. रह जाये। इस आधा कि.ग्रा. मिट्टी के नमूने को सुखाकर व छानकर साफ-सुथरी पॉलीथीन में भर लें। पॉलीथीन पर कृषक का नाम, खेत का नं. या पहचान व पूरा पता स्पष्ट रूप से लिख दें। सम्बन्धित केन्द्र 15-20 दिनों के अन्दर मृदा परीक्षण की रिपोर्ट आपके पते पर भेज देगा या स्वयं केन्द्र पर जाकर इसे प्राप्त कर लें।

बासमती धान की पौध तैयार करना: धान की पौध तैयार करने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें, जहाँ पर सिंचाई जल की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध हो। भरपूर पैदावार हेतु बीज की बुवाई सही समय पर की जानी चाहिए। धान की लम्बी अवधि वाली प्रजातियों की बुवाई मई के अन्तिम सप्ताह से लेकर जून के प्रथम सप्ताह के दौरान करना उपयुक्त रहता है जबकि सुगन्धित धान की जल्दी पकने वाली किस्मों की बुवाई जून के प्रथम सप्ताह से मध्य जून तक कभी-भी कर सकते हैं। यदि धान की रोपाई बहुत बड़े क्षेत्र में करनी है तो नर्सरी की बुवाई 4 से 5 दिन के अन्तराल पर दो या तीन बार करें। जिससे रोपाई के समय धान की पौध अधिक पुरानी न हो। क्योंकि कभी-कभी सिंचाई जल, कृषि मशीनरी या श्रमिकों की अनुपलब्धता के कारण धान की रोपाई में देरी हो जाती है। एक हैक्टेयर में धान की रोपाई के लिए 600-800 वर्गमीटर नर्सरी का क्षेत्र पर्याप्त होता है। इसके लिए बासमती किस्मों का 22-24 कि.ग्रा. स्वस्थ बीज पर्याप्त होता है। नर्सरी क्षेत्र में एक टन अच्छी सड़ी गोबर की खाद, 12.5 कि.ग्रा. यूरिया, 15.0 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट व 15.0 कि.ग्रा. नाइट्रेट ऑफ पोटाश को समान रूप से डालकर मिट्टी में अच्छी तरह से मिला दें। बासमती धान की प्रमुख प्रजातियों में पूसा बासमती 1509, पूसा 1612, पूसा 1592, पूसा बासमती 1609, पूसा बासमती 1637, पूसा बासमती 1728, पूसा बासमती 1718, पूसा सुगन्ध-4 (पूसा 1121), पूसा बासमती-6 (पूसा 1401), पी.आर.एच.-10 (संकर), पूसा सुगन्ध-2, पूसा सुगन्ध-3, नरेन्द्र ऊसर संकर धान-3, पंत संकर धान-3, डीआरआरएच-2, उन्नत पूसा बासमती-1 (पूसा 1460) सम्मिलित हैं। बुवाई से पूर्व बीज को रात भर पानी में भिगोकर रखें। इसके बाद बीज को पानी से निकाल कर छाया में हल्की परत के रूप में फर्श पर फैला दें। इस बीज में एक से दो दिन में अंकुरण दिखने लगे तो खेत में बुवाई करें।

कपास की बुवाईः उत्तर भारत में कपास की बुवाई का उपयुक्त समय 15-25 मई के बीच है। जबकि मध्य भारत के सिंचित क्षेत्रों में कपास की बुवाई 15-30 मई तक अवष्य कर दें। वर्षाआधारित क्षेत्रों में कपास की बुवाई मानसून आने पर ही करें। कपास का बेहतर उत्पादन लेने के लिए बुवाई हमेशा लाइनों में करनी चाहिए। कपास की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 75 सें.मी. रखनी चाहिए। प्रति इकाई क्षेत्र सामान्य पौध संख्या बनाये रखने के लिए दो बीज प्रति छिद्र बोने चाहिए। अंकुरण के 20 दिन बाद एक स्थान पर एक ही स्वस्थ पौधा रखें एवं कमजोर पौधे को निकाल दें। बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। जिससे बीजो का अंकुरण शीघ्र व एक समान हो सके। बीज की बुवाई 3 सें.मी. की गहराई पर करनी चाहिए। बुवाई के 8-10 दिन बाद यदि किसी स्थान पर पौधे मर गये हो या अंकुरण न हुआ हो तो उस स्थान पर बीज पुनः बोया जा सकता है। बुवाई पूरब-पश्चिम दिशाओं में करनी चाहिए। जिससे सभी पौधों को सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में और लम्बी अवधि तक मिलता रहे। किसान भाइयों को सलाह दी जाती है कि बुवाई कभी भी छिटकवां विधि से न करें। जिन क्षेत्रों में जलभराव की समस्या रहती है। वहाँ पर कपास की बुवाई मेढ़ों पर करनी चाहिए।

आलू भंड़ारण: उत्तर-पश्चिम भारत में आलू का अधिकांष उत्पादन फरवरी-मार्च माह के दौरान होता है। इस समय किसानों को बाजार में आलू का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। अतः आलू को भंड़ारित करने की आवष्यकता पड़ती है। घरों के अन्दर या खेतों पर ढेरों में रखे आलूओं में खुदाई के दो माह बाद सूखने, अंकुरित होने व सड़ने की वजह से लगभग 15-20 प्रतिशत तक वजन में कमी आ जाती है। साथ ही आलू सिकुड़ने के कारण उचित मूल्य पर नहीं बिक पाता है। अतः उपरोक्त नुकसान से बचने के लिए शीत गृहों में आलू का भंडारण नितान्त आवश्यक है। ऐसा करने से आलू की पैदावार का एक बड़ा भाग सड़ने-गलने व सूखने से बचाया जा सकता है। परन्तु शीत गृहों की सीमित भंडारण क्षमता व उनके आसमान छूते किराये से बचने के लिए किसान भाई मार्च से मई के अन्त तक स्वस्थ व साफ-सुथरे आलू को बगीचों अथवा हवादार एवं छायायुक्त स्थानों पर 6 इंच मोटी पुआल/फूंस से अच्छी तरह ढेर को ढ़क कर रख सकते हैं। याद रहे ढेर की ऊँचाई एक मीटर व जमीन पर चैड़ाई तीन मीटर से अधिक न हो। इससे आलुओं में सिकुड़न नहीं होती तथा वजन में होने वाली कमी भी बहुत घट जाती है।

ग्रीष्म-कालीन जुताई: खेतों की मई में गहरी जुताई करके खुला छोड़ दें। ऐसा करने से हानिकारक कीड़े-मकोड़े तेज धूप में मर जाते हैं। रबी फसलों की कटाई के पश्चात अधिकांश खेत खाली हो जाते हैं। यह समय ग्रीष्म-कालीन जुताई के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। मृदा जनित रोगों व चिर स्थायी खरपतवारों के वानस्पतिक भागों व बीजों के अलावा निमेटोड़ को भी नष्ट करने के लिए मई के महीने में खेतों की 2-3 बार गहरी जुताई करें। इससे न केवल मृदा उर्वरता बढ़ती है, बल्कि मृदा की जल धारण क्षमता में भी सुधार होता है। गर्मियों में गहरी जुताई करने से अनेक बहुवर्षीय खरपतवारों जैसे दूब-घास, मौथा व कांग्रेस घास को आसानी से समाप्त किया जा सकता है। इससे भूमि के अन्दर वायु संचार में भी सहायता मिलती है। जिससे पौधों की वृद्धि व विकास के साथ-साथ मृदा में उपस्थित अनेक उपयोगी सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है।

बागवानी: इस माह में गर्म व तेज हवायें चलने से फलदार वृक्षों को अत्यधिक नुकसान पहुँचता है। अतः बचाव हेतु वायुरोधकों का प्रयोग किया जा सकता है। नए लगाये गये पौधों में एक सप्ताह के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। छोटे पौधे की सिंचाई वलय विधि से करनी चाहिए। बड़े पेड़ों की सिंचाई परिवर्तित कूंड विधि से करनी चाहिए। अंगूर के गुच्छों की पूर्ण रूप से पक जाने पर ही तुड़ाई करनी चाहिए। नये बाग लगाने के लिए गड्ढे़ खोदने का भी यह उपयुक्त समय है। गड्ढ़े खोदने से पूर्व खेत को गहरा जोतकर समतल कर लेना चाहिए। इसके बाद 1x1x1 मीटर के गड्ढ़े खोद लेने चाहिए। आम की प्रमुख प्रजातियों में पूसा प्रतिभा, पूसा लालिमा, पूसा मनोहरी, पूसा सूर्या, दशहरी-51, रामकेला, अम्बिका, आम्रपाली, दशहरी व पूसा अरूणिमा सम्मिलित हैं। पपीते की उन्नतशील प्रजातियों में पूसा डेलिशियस, पूसा मैजेस्टी, पूसा नन्हा, रेड़ लेड़ी, सूर्या व पूसा ड़वार्फ प्रमुख हैं। अमरूद के लिए पूसा सृजन, लखनऊ-49, श्वेता, ललित, अर्का अमूल्य, इलाहाबाद सुर्ख व इलाहाबाद सफेदा शामिल हैं। अंगूर की प्रजातियों में पूसा त्रिसार, पूसा स्वर्णिका, पूसा नवरंग, पूसा सीडलेस, परलेट, पूसा उर्वशी व फलेम सीडलेस प्रमुख हैं।

 

डॉ.वीरेन्द्र कुमार
जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली

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