मिट्टी की सुगन्ध कहीं खो न जाए

मनुष्य को अपना जीवन चलाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। जैसे स्वस्थ शरीर में जब तक प्राण शक्ति का संचार है तभी तक उसे जीवित कहा जाता है। ठीक उसी प्रकार मिट्टी को स्वस्थ रखने में और पौधों का जीवन चक्र चलाने के लिए विभिन्न पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। मिट्टी की प्राण शक्ति (जैविक अंश) जितनी अधिक होगी उतनी ही वह पैदावार बढ़ाने में योगदान कर सकेगी, लेकिन यदि किन्हीं कारणों में मिट्टी में प्राण शक्ति/जैविक अंश कम या ख़त्म हो जाए तो मिट्टी बंजर हो जायेगी और फिर फसल उत्पादन बहुत कठिन हो जायेगा।

मिट्टी व जल हमारे जीवन में दो प्राकृतिक संसाधन हैं जिनका हमारे जीवन में गहरा संबंध है लेकिन मनुष्य ने इन प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग करके अपने व देश के लिए एक गम्भीर समस्या पैदा कर दी है। आज देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है जमीन की उपजाऊ शक्ति का कम होना, सिंचित जल का अत्याधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन का फसलों की पैदावार पर प्रभाव, बढ़ते कीट व बीमारियाँ, रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग व अन्न, जल व वायु में बढ़ता प्रदूषण जिसके परिणाम आने वाली पीढ़ी पर ख़तरनाक रुप में सामने आ सकते हैं। बढ़ती हुई आबादी की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करना हम सब का कर्त्तव्य है।

देश की जनसंख्या आगामी 10 वर्ष में 150 करोड़ के आसपास होने का अनुमान है। राष्ट्रीय स्तर पर अभी 80-100 लाख टन पोषण तत्त्व फसलों द्वारा प्रति वर्ष शोषित किये जा रहे हैं। यदि हम पोषक तत्त्वों का दोहन कम न कर पाए तो कृषि उत्पादन के बढ़ते लक्ष्य को पाना असम्भव हो जायेगा। लेकिन सबसे ज्यादा भूमिका किसानों की है जो अच्छी कृषि प्रणाली अपनाकर उपलब्ध भूमि तथा जल संसाधनों का अच्छी तरह से प्रयोग करके आधुनिक कृषि तकनीकों, मशीनीकरण अपनाकर भूमि में होने वाले दुष्प्रभावों को रोक सकते हैं व जरुरत से ज्यादा लागत को कम करके खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आओ हम सब इस दिशा में किसानों के साथ खड़े होकर अपनी मिट्टी की सुगन्ध को वापिस लौटाने में महत्त्वपूर्ण कदम बढ़ायंे। किसान भाई क्या कर सकते हैं -

  1. मिट्टी पानी जाँच- सबसे पहले किसान भाई मिट्टी व सिंचाई जल की जाँच करवायें, ताकि मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्त्वों की मात्रा/कमी का अनुमान लगाया जा सके व उर्वरकों की उचित मात्रा उपयोग कर सकें। मिट्टी व जल का नमूना लेने का तरीका व अन्य जानकारी अपने नजदीकी कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केन्द्र से सम्पर्क करके ले सकते हैं। सभी राज्यों में मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालायें स्थापित की गई है जहाँ ये जाँच या तो मुफ़्त या बहुत कम फीस लेकर की जाती है।
  2. उर्वरकों का उचित व सन्तुलित प्रयोग- अधिकतर किसान यूरिया का प्रयोग अधिक मात्रा में करते हैं जिससे कीड़े व बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है व भूमि व जल में ख़तरनाक रसायन वातावरण, जल व भूमि को दूषित करते हैं। सन्तुलित प्रयोग से न केवल अनावश्यक लागत कम की जा सकेगी बल्कि भूमि के स्वास्थ्य को भी बरकरार रखा जा सकेगा।
  3. फसल प्रबन्धन- किसान भाई उचित किस्म बीज मात्रा व बिजाई का समय अपना कर न केवल पैदावार अच्छी ले सकेंगें बल्कि होने वाले वातावरण प्रदूषण को भी रोक सकेंगें।
  4. रसायनों का सही व उचित प्रयोग- किसी भी फसल में यदि खरपतवारनाशी, कीट व बीमारी का सही समय पर सही अवस्था पर प्रयोग किया जाये तो मिट्टी की उपजाऊ शक्ति में होने वाली कमी को रोका जा सकता है। अधिक उत्पादन की चाह में भूमि, जल व वातावरण में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है।
  5. सिंचाई जल का सदुपयोग- सिंचाई जल एक प्राकृतिक संसाधन है जिसकी सुरक्षा हम सब का नैतिक कर्त्तव्य है। फसलों का चुनाव, फसल चक्र, फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश, सिंचाई की नवीनतम विधियाँ जैसे ड्रिप प्रणाली, भूमिगत सिंचाई प्रणाली, टपका सिंचाई फव्वारा सिंचाई अपना कर सिंचित जल का सदुपयोग करके भूमि में होने वाले दुष्प्रभाव को रोका जा सकता है। लेजर लेवलर तकनीक अपना कर 20-30 प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है। मिट्टी में जीवांश की मात्रा कम होने से जलधारण क्षमता भी कम हो जाती है।
  6. मिट्टी का रखरखाव- अधिकतर किसान फसल कटाई के बाद फसल अवशेषों को आग लगा देते हैं। जिससे मिट्टी में उपलब्ध उपरी सतह पर मौजूद जैविक अंश, पोषक तत्त्व व लाभदायक जीवाणु जलकर नष्ट हो जाते हैं। कईं किसान भाई अपने खेतों से 1-3 फुट मिट्टी उठवा देते हैं जिससे भूमि की उर्वरकता व उत्पादकता कम हो जाती है। फसल अवशेष प्रबन्धन, नई तकनीक का प्रयोग, दलहनी फसलों का समावेश, जीवाणु खादांे का प्रयोग, जैविक खादों/ हरी खाद जैसी अन्य तकनीक अपना कर भूमि की दशा को सुधारा जा सकता है।

      इन सब सुझावों को अपना कर हमें अपने सीमित संसाधनों से उच्च उत्पादन लेने की ओर कदम बढ़ाना होगा। क्योंकि विभिन्न कारणों से आज देश की कुल 23.5 करोड़ हैक्टर जमीन में से लगभग 16.6 करोड़ हैक्टर जमीन ख़राब हो चुकी है। अधिक अन्न उत्पादन के लिए सिंचाई जल का उचित उपयोग भी जरूरी है। हमारी जरूरत के लिए प्राकृतिक जल का केवल 0.5 से 1 प्रतिशत भाग ही उपलब्ध है। यदि हम इन प्राकृतिक भूमि संसाधनों का संरक्षण करेंगें तो वर्ष 2025 तक खाद्यान्न उत्पादन 30 करोड़ टन होने की सम्भावना की जा सकती है। हमें हर प्रयत्न से इन संसाधनों को विनाश होने से बचाना होगा, क्योंकि मिट्टी की 1 इंच ऊपरी सतह को बनने में 200 से 1000 वर्ष तक लगते हैं। हमें अपनी मिट्टी की सुगन्ध लौटानी होगी, जिसके लिए महात्मा गाँधी जी की कही बात को याद रखना बहुत जरूरी है-

‘‘जमीन हरेक के भरपेट के लिए तो उत्पादन दे सकती है, लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं’’


नरेन्द्र कुमार गोयल
कृषि विज्ञान केन्द्र, दामला, यमुनानगर (हरियाणा)

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