पॉली हाउस में सूत्रकृमि का प्रकोप - समस्या व समाधान

देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान में कृषि उत्पादन प्रायः सूखे से प्रभावित होता रहता है। राजस्थान के सम्पूर्ण खेती योग्य क्षेत्र का लगभग 70 प्रतिशत भाग बारानी (वर्षा आधारित) है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन से कृषि उत्पादन पर प्रभाव स्पष्ट रुप से देखे जा रहे हैं तथा विगत वर्षों में जलवायु परिवर्तन के परिदृश्य में वर्षा की विषम परिस्थितियों जैसे:- वर्षा का विलम्ब से प्रारम्भ होना। बीच में लम्बे समय तक सूखे की स्थिति का होना। वर्षा का जल्दी समाप्त होना। फसल की विभिन्न अवस्थाओं पर भारी वर्षा व बाढ़ की स्थिति तथा लम्बे समय के बाद मानसून के अंत में अच्छी वर्षा का होना इत्यादि। ऐसी दशा में किसान के लिए सामान्य मौसम में खुले वातावरण में फसलें उगाना मुश्किल होता जा रहा है तथा प्रति हैक्टेयर फसलों की पैदावार भी घटती जा रही है।

इस जलवायु परिवर्तन व घटती पैदावार के चलते यह आवश्यक है कि किसान नई तकनीकें या विधियाँ अपनाएं जिससे बदलते मौसम का असर फसलों की उत्पादकता पर कम हो। इस परिस्थिति को देखते हुए संरक्षित वातावरण में खेती ही एक ऐसी तकनीक है जिसमें फसलोत्पादन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जा सकता है तथा पैदावार व गुणवत्ता मे वृद्धि की जा सकती है। इस प्रकार की तकनीक, उच्च उत्पादकता के साथ-साथ कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन करने में सक्षम है। इस तकनीक में प्रति इकाई क्षेत्रफल उत्पादन (4-5 गुना) तो अधिक मिलता ही है साथ ही बे-मौसमी फल व सब्जियाँ जैसे - खीरा, तरबूज, खरबूज, शिमला मिर्च, टमाटर आदि। फूलों में जरबेरा, कॉर्नेशन, गुलाब आदि सालभर उगाई जा सकती हैं। पॉली हाउस के अंदर का तापमान बाहरी तापमान से 5-10 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहता है, जबकि पूर्ण रुप से फसल नियंत्रण वाले पॉली हाउस में तापमान, नमी, प्रकाश आदि फसल की आवश्यकतानुसार निर्धारित किये जाते हैं।

मृदा में फसलों के कई प्रकार के दुश्मन उपस्थित  होते हैं, जैसे - बैक्टीरिया, फंजाई, प्रोटोजोआ, वायरस व सूत्रकृमि। इनमें से सूत्रकृमि सबसे ज्यादा हानिकारक हैं, जैसे - जड़ गाँठ, गुर्दाकार, स्तम्भन पुट्टी, वृक्काकार, सर्पिल सूत्रकृमि आदि। इनमें से जड़ गाँठ सूत्रकृमि पॉली हाउस में ज्यादा नुकसान करता है। पॉली हाउस में तापमान व नमी इसके अनुकूल रहते हैं।

 पॉली हाउस मे सूत्रकृमि के फैलने के कारण -

अनुकूल वातावरण -

  1. पॉली हाउस में अन्दर का तापमान व आर्द्रता सूक्ष्मजीव/सूत्रकृमियों के लिए अनुकूल होती है।
  2. संक्रमित मृदा, बीज व पौधों का प्रयोग।
  3. संक्रमित नर्सरी का प्रयोग।
  4. 4. एक ही कुल की फसल लेना।
  5. 5. संक्रमित मृदा में प्रयोग किए गए औज़ारों व मशीनों द्वारा।
  6. 6. अधिक उर्वरकों का प्रयोग करने से पॉली हाउस में फसलों के साथ-साथ सूत्रकृमि भी बढ़ते हैं।

 

सूत्रकृमि द्वारा उत्पन रोग के लक्षण -

  1. पौधे की जड़ों पर मोटी गाँठें बन जाती हैं।
  2. नियमित सिंचाई करने पर भी पौधा मुरझा जाता है।
  3. पौधा आसानी से उखड़ जाता है।
  4. 4. रोगग्रसित पौधों की वृद्धि रुक जाती है।
  5. 5. पत्तियों में पीलापन, मुरझाना, पुष्प तथा फल बनने में देर एवं फलों की संख्या एवं आकार में कमी हो जाती है।
  6. 6. पौधों की जड़ों में जहाँ सूत्रकृमि रहते हैं, वे फूल कर अनिश्चित आकार की ग्रंथियों में परिवर्तित हो जाती है।
  7. 7. अधिक चौड़ी पत्तियों वाले पौधे, जैसे तम्बाकू या खीरा वर्ग के पौधों में दिन के समय मुरझान/म्लानि के लक्षण देखे जा सकते हैं।

 

रोग से क्षति -

  1. मूल-ग्रंथि सूत्रकृमियों के आक्रमण से पौधों में जल एवं पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है तथा अनेक कन्द-मूल फसलें, से-हल्दी, अदरक, आलू आदि कुरुप एवं विकृत हो जाती हैं। जिससे उनका विक्रय मूल्य घट जाता है।
  2. यह पौधों के मूलाग्रों को नष्ट करता है।
  3. मूलग्रंथि सूत्रकृमियों के प्रकोप के कारण पौधे दूसरे रोगजनकों के लिए रोगग्राही हो जाते हैं।
  4. पौधों में रोगप्रकोप बढ़ जाता है तथा कई बार सम्पूर्ण फसल नष्ट हो जाती है।

 

पॉली हाउस  मे सूत्रकृमि का प्रबन्धन -

  1. मिट्टी की जाँच - पॉली हाउस के निर्माण से पूर्व सूत्रकृमि हेतु मिट्टी की जाँच करायें।
  2. पॉली हाउस के निर्माण के समय उसके चारों ओर की दीवार कम से कम 1- 2 फीट ऊँची होनी चाहिए ताकि बाहर का व्यर्थ पानी व पानी के साथ सूत्रकृमि बाहर से अंदर नही जा सके।
  3. पॉली हाउस का मुख्य द्वार सीमेंट से पक्का बनायें।
  4. पॉली हाउस में उपयोग आने वाले सभी यंत्रों व औजारौं को अलग रखना चाहिए तथा उनका प्रयोग पॉली हाउस से बाहर नही करें।
  5. नर्सरी तैयार करने के लिए निर्जमीकृत माध्यमों जैसे कोकोपिट, फोम, ब्लॉक, रॉक वुल आदि का प्रयोग करें।
  6. जहाँ तक सम्भव हो प्लास्टिक ट्रे में ही नर्सरी तैयार करें।
  7. प्लान्टिंग बेड्स का निर्जमीकरण (फ्यूमिगेशन) करें।

राम नारायण कुम्हार
शोध छात्र, सूत्रकृमि विभाग
राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय,
उदयपुर, राजस्थान - 313001

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