सरसों के प्रमुख नाशी जीवों का जैविक प्रबन्धन

परिचय - सरसों (ब्रेसिका स्पीसीज) भारत की प्रमुख तिलहनी फसलों में से एक है। इसका उत्पत्ति स्थान यूरोप को माना जाता है। भारत के अघिकतर राज्यों मे सरसों की खेती की जाती है। परन्तु राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा असम में मुख्य रुप से इसकी खेती की जाती है। रबी की फसलों में सरसों को राजस्थान की मुख्य फसल माना जाता है। क्योंकि यहाँ का मौसम, वातावरण तथा भूमि सरसों की फसल के लिए बहुत उपयुक्त है। भारत में वर्ष 2013-14 में सरसों का 71.30 लाख टन उत्पादन प्राप्त हुआ। सरसों क्रुसीफेरी परिवार के अन्तर्गत आती है। इसकी खेती मुख्य रुप से तेल प्राप्त करने के लिए की जाती है। इसके बीज (दानों) से निकलने वाले तेल का प्रयोग खाना बनाने में शरीर की मालिश करने में, साबुन,आचार,मसाला तथा ग्रीस बनाने में होता है। सरसों के पौधों से बीज निकालने के बाद उनके बचे पौधोंको जलाने के काम में लेते हैं। आज के समय में सरसों की फसल को अधिकतर थ्रेशर से निकालते है। जिससे सरसों का दाना अलग हो जाता है तथा पौधों का भूसा बन जाता है। जिसका प्रयोग पशुओं के चारे के रुप में कम्पोस्ट खाद बनाने में तथा गत्ता फैक्ट्री में व्यापक रुप में होने लगा है। सरसों के बीज से तेल निकालने के बाद बची हुयी खली पशुओं  को खिलायी जाती है। यह पशुओं के लिए मुख्य पोषक तत्वों का काम करती है।

इसकी खली में  नाइट्ोजन 5.2 प्रतिशत, पोटाश  1.2 प्रतिशत तथा फास्फोरस 1.8 प्रतिशत पाया जाता है। इसलिए सरसों की खली  जैविक खाद के रुप में तथा पशु पोषक तत्वों दोनों तरह से उपयोगी है। सरसों के बीज मे तेल 24-40 प्रतिशत, प्रोटीन 17-26 प्रतिशत और छिलका 19 प्रतिशत पाया जाता है। सरसों के तेल में प्रचुर मात्रा में फैटी एसिड ओमेगा -3 व ओमेगा -6 पाया जाता है। जो दिल की बीमारियों के लिए बहुत लाभदायक है। इसकी हरी पत्त्तियों को भी हरी सब्जीकेरुप में प्रयोग किया जाता है। अतः सरसो का हमारे दैनिक जीवन में बहुत महत्व है।

सरसों की फसल में लगने वाले कीटों व बीमारियों का उचित जैविक नियन्त्र्रण समय पर अपनाकर इसके उत्पादन को अघिक बढा सकते हैं तथा साथ ही उत्पादन लागत को भी कम किया जा सकता है। विभिन्न प्रकार के कीटों से सरसों में 15 से 25 प्रतिशत तक नुकसान तथा बीमारी (रोगों) के द्वारा सरसों में 50 से 60 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। उनमें मुख्य रुप से चैपा या माहॅू, आरा मक्खी, चितकबरा कीट तथा बीमारियों मे पर्ण अंगमारी, सफेद रतुआ, स्कलेगेटिनिया विगलन तथा चूर्णित आसिता आदि। यदि देश के सरसों उत्पादन कर्त्ता समय पर जैविक कीट एवं रोगनाशकों का उचित मात्रा में प्रयोग करे तो वह हानिकारक रसायन मुक्त, गुणवत्ता से युक्त, शुद्ध सरसों का तेल एवं खली  प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ -साथ मधुमख्खियों की सुरक्षा एवं शुद्ध शहद उत्पादन एवं उपज वृद्धि से अधिक लाभ प्राप्त कर सकते है।

  

सरसों के मुख्य कीट

चेपा / माहू (लियोफिस इरीसिमी कलट) - यह कीट लगभग पुरे भारतवर्ष मे पाया जाता है। तथा इसका प्रकोप नवम्बर के दुसरे सप्ताह से जनवरी के अन्तिम सप्ताह तक अधिक रहता है। यह कीट छोटा, कोमल-सफेद हरे रंग का होता है। इसके शरीर के अन्तिम हिस्से पर कोर्निक्लस (हुक जैसा चिन्ह) पाया जाता है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ दोनों ही पौधे के विभिन्न भागों से रस चुसकर क्षति पहुॅंचाते हैं। यह कीट लगभग 25-30 प्रतिशत तक फसल को हानि पहुचा सकता है। इस का आर्थिक क्षति स्तर 50-60 माहू पौधों के ऊपरी 10 सेमी. भाग में है। यह कीट उचित वातावरणीय दशाओं में बहुत तेजी से बढता है। इसकी प्रौढ एक बार में 30-150 तक शिशुओं को जन्म दे सकती है। इसकी वर्ष भर में 45 पीढियाँ तक पायी जाती है। यह कीट सरसों के अलावा तोरियां, राई, पत्तागोभी, गुलाब तथा गैंदा आदि फसलों को भी नुकसान पहुँचाता है।

 

चितकबरा कीट (बगराडा हिलेरिस वर्म) - चितकबरा कीट, क्रुसीफेरस परिवार की फसलों का एक बहुत हानिकारक कीट है। इस कीट का आगमन भारत में म्यामार से हुआ था। यह धीरे-2 लगभग भारत के सभी सरसों उत्पादन करने वाले क्षेत्रों मे फैल गया। यह राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा उत्तराखण्ड मे अधिक हानि पहुँचाता है। इस कीट का प्रौढ 3.71 मिमी. लम्बा तथा 3.30 मिमी. चौडा होता है। इसका प्रौढ सुन्दर तथा शरीर के ऊपर गुलाबी व भूरे रंग के चमकीले धब्बे लिये होते हैं। इसकी प्रौढ हल्के पीले रंग के अण्डे 3-8 के समूह में पत्तियों पर देती है। कभी - कभी जमीन पर भी अण्डे दे देती है। यह क्रुसीफरेस फसलों के साथ-साथ धान, गन्ना तथा कॉफ़ी को भी नुकसान पहुँचाता है। इस कीट के प्रौढ तथा शिशु दोनों ही पौधों की विभिन्न अवस्थाओं में पत्तियों से रस चूसकर उसे हानि पहुँचाते हैं। यह छोटे पौधों को अधिक हानि पहुँचाते हैं, जिससे दाने सिकुड जाते हैं तथा दाने की उपज व तेल की मात्रा में भारी कमी पायी जाती है।

 

सरसों की आरा मक्खी (एथेलिया ल्यूजन्स प्रोक्सीया कल्ग) - सरसों का यह कीट भारत के कुछ राज्यों जैसे- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा बिहार मे बहुत हानि पहुँचाता है। इस कीट का प्रौढ हल्के गुलाबी-पीले रंग तथा उसके पंख पारदर्शी होते है। तथा यह अक्टूबर से नवम्बर तक अधिक सक्रिय रहता है। इसके लार्वा (झल्ली) का शरीर बेलनाकार व हरे काले रंग का होता है। इसके शरीर पर पाँच काली धारियाँ पाई जाती हैं। इसके लार्वा की लम्बाई 15-18 मिमी. तक होती है। यह कीट क्रूसीफेरस परिवार की विभिन्न फसलों को हानि पहुँचाता है। यह कीट फसल के शुरुवाती समय (वृद्धिकाल) में अधिक हानि पहुचाता है। इसकी लार्वी पौधों की पत्तियों को खाकर हानि पहुँचाती है। यह कीट उपज में 30-35 प्रतिशत तक हानि पहुँचा सकता है।

सरसों का लीफ वेबर (क्रोसीडोलोनिया बाईनाटलीस) - सरसों का यह कीट भारत के लगभग सभी सरसों के उत्पादन करने वाले क्षेत्रों मे पाया जाता है। इस कीट की प्रौढ पीले-भूरे रंग की होती है तथा पंखों के ऊपर भूरे रंग के छब्बे पाये जाते है। इसके लार्वा का रंग हल्का पीला-भूरा तथा साइड (बराबर) में काली लाइन पाई जाती है। यह सरसों के साथ-साथ अन्य फसलों जैसेः फूलगोभी, मूली तथा अन्य क्रुसीफेरस फसलों को भी नुकसान पहुँचाते है। इसकी मादा प्रौढ एक बार में 50-100 अंडे पत्तियों की निचली  सतह पर देती है। अण्डे से लार्वा 5-15 दिनों मे बाहर निकल आता है। इसकी लार्वा पत्ती के ऊपर समूह में इकठ्ठा होकर सबसे पहले क्लोरोफिल वाले भाग को खाती है तथा पत्ती को जालीदार बना देती है। इससे फसलों मे 20-25 प्रतिशत नुकसान होने की सम्भावना रहती है।

 

सरसों के मुख्य रोग

सफेद रतुआ - सफेद रतुआ एक फंफूद जनित रोग है। यह सर्वप्रथम पौधों की पत्तियों की निचली सतह पर दिखाई पड़ता है। किन्तु जब यह रोग उग्र रुप धारण कर करता है तो परपोषी पौधे की पत्तियाँ मोटी होकर मुड जाती ओर आकार में छोटी तथा गुच्छेदार हो जाती हैं। यह पौधों के जड वाले भाग को छोडकर यह फंफूद अन्य सभी भागों जैसे- तना, पत्ती, फूल तथा फल आदि पर दिखाई पडती है। यह रोग सफेद या क्रीम जैसे हल्के पीले रंग के धब्बों के रुप मे पौधों के विभिन्न भागों पर दिखाई पडता है।

 

छाछया रोग (चूर्णिल असिता) - यह फंफूदी जनित रोग है। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों की सतह पर छोटे- छोट धब्बों के रुप में दिखाई देती है। जो बाद में पत्तियों एवं तनों पर सफेद पाउडर के रुप मे दिखाई देते हैं। कुछ समय बाद रोगी पौधों के प्रभावित भाग पीले पड़ जाते हैं। पत्तियाँ समय से पहले गिर जाती है। यह रोग देर से बोयी गयी फसलों पर तापमान बढने के कारण अघिक आता है। इस रोग से फसलों मे भारी होने की सम्भावना रहती है।

 

आल्टरनेरिया पर्ण अंगमारी - यह रोग सरसों उगाने वाले लगभग सभी क्षेत्रों में सामान्य रुप से पाया जाता है। जो पौधों के ऊपरी भागों को प्रभावित करता है। जैसे- तना, पत्तियॉं व शाखाऐं आदि इस धब्बा रोग भी कहते हैं। यह रोग सबसे पहले पौधों की पत्तियों पर दिखाई पडता है। जो बाद में अनुकूल मौसम मिलते ही पौधे के अन्य वायवीय भागों पर फैल जाता है। इससे प्रभावित पौधों की पत्तियों पर छोटे बिखरे भूरे अथवा गहरे रंग के नैक्रोटिक धब्बे दिखाई पडते है। इन धब्बों के कारण पौधे के प्रकाश संश्लेषक मे कमी आ जाती है। अतः पौधा धीरे-धीरे मर जाता है। इससे प्रभावित फसल में लगभग 25-50 प्रतिशत तक नुकसान होने की सम्भावना रहती है।

 

तना गलन रोग - यह रोग स्कलेरोटिनिया नामक फंफूद के द्वारा फैलता है।इस रोग का प्रकोप फसल पर फूल आने की अवस्था से शुरु होता है।इस रोग के लक्षण पत्तियों पर कम दिखाई पडते हैं। जबकि तने शाखाओंपर अधिक दिखाई पडते हैं। तने के निचले हिस्से पर यह मटमैले तथा भूरे रंग के धब्बे जो बाद में फफोले राई जैसे सफेद जाल से तने का ढक देते हैं। जिस सेपौधा बीचसे मुडकर लटक जाता है। और अंत में सूख कर मर जाता है। जब मौसम नम और ठण्डा होता है तो यह तेजी से फैलता है।  

 

मृदुरोमिल असिता (डाऊनी मिल्डयू) - यह रोग पौधों को वृद्धिकाल में अधिक प्रभावित करता है। यह फसल बुवाई के 20-25 दिन बाद आना शुरु होता है। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पौधों की पत्तियों की निचली सतह पर बैंगनी -भूरे रंग के धब्बे दिखाई पडतें है। यह छोटे तथा बडे दोनों आकार के होते हैं। पत्तियों की ऊपरी सतह पर घब्बों के स्थान पर पीलापन दिखाई पडता है। बहुत अघिक नमी मे इस रोग के फंफूद तनों पर भी दिखाई देता है।

सरसों की कुछ मुख्य किस्में -

 

जे.एम. (सफेद रेतुआ प्रतिरोधी), पूसा जय किसान, पूसा आदित्य, किरण, आर.एल.एम. 619 (स्कलेरोनिया तना गलन प्रतिरोधी), पूसा सरसों 26 (मृदुरोमिल असिता प्रतिरोधी), पूसा बोल्ड़, लक्ष्मी, आर.एच.319, आर.एच.-205, सलोनी, सुपर ज्योति।

जैविक विधियों से नाशी जीवों का उचित प्रबन्धन     

  1. बुवाई से पूर्व व बुवाई के समय सावधानियाँ -
  • ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करनी चाहिए ताकि जमीन के अन्दर हानिकारक फंफूद के जो अवशेष हैं, वो नष्ट हो जाएं।
  • खेत को बुवाई से पूर्व समतल कर लेना चाहिए जिसे उचित जल निकास का प्रबन्ध हो सके।
  • बुआई से 15 दिन पूर्व मिट्टी की जॉच करवाकर मृदा स्वास्थ कार्ड बनवायें तथा उसी के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करें । नाइटोजन की अधिक मात्रा नही होनी चाहिए। इससे माहू/चैपा व चूषक कीटों की बढने की सम्भावना रहती है। जिंक सल्फेट या सल्फर 15 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर अवश्य उपयोग करें।
  • पूर्व फसलों के अवशेषों को जलाना नही चाहिए। फसल अवशेष को एकत्रित करके उनमें (जैविक डिकम्पोजर) मिलाकर उनसे देशी खाद बनायें फिर आगामी फसलों मे खाद के रुप में खेत में प्रयोग करें।
  • समुचित फसल -चक्र का अपनाना चाहिए। जैसे- सरसों के बाद गन्ना, अगेती मूंग/उडद के बाद सरसों, लोबिया /ज्वार के बाद सरसों, ग्वार के बाद सरसों।
  • फसल की बुवाई 1-15 अक्टूबर तक कर देनी चाहिए।
  • प्रमाणित उन्नत बीज, स्वस्थ रोगरोधी तथा क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत की गयी किस्मों का ही बुवाई के लिये प्रयोग करें ।
  • बीज को ट्राईकोड्रमा (संजीवनी) 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज व जर्मीफास्ट 5-10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से अवश्य उपचारित करें। इससे बीज को फंफूद जनित रोगों से सुरक्षा तथा अंकुरण स्वस्थ शीघ्र एवं बीज जमाव प्रतिशत में बढ़ोतरी होगी।
  • भूमि को ट्राईकोड्रमा (संजीवनी) 2 किलोग्राम तथा स्यूडोमोनास फल्यरोसेंस (फसल रक्षक) 2 किलोग्राम प्रति एकड को 50 किलोग्राम सडी हुई गोबर की खाद में मिलाकर भूमि को उपचारित करें। अन्तिम जुलाई से पहले खेत में डालकर जुताई कर दें।
  • बीज की उचित मात्रा का प्रयोग करें कतार से कतार की दूरी व पौघे से पौघे कर दुरी 30 × 10 सेमी. तथा बीज 5 से 2.0 सेमी. की गहराई पर ही बोयें। कतार में एक स्थान पर अधिक पौधे जमने पर कमजोर पौधों को उखाड दें।

 

  1. वानस्पतिक वृद्धिकाल तथा फूल व फलियों के समय सावधानियाँ -
  • छोटी फसल में सिंचाई के साथ- साथ सल्फर का भी प्रयोग करें जिसें फसल के पौधों में बीमारीयों व चितकबरा कीट से लडने की प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न होती है।
  • खेत मे सिंचाई का पानी खडा नहीं होना चाहिए अन्यतः नमी अधिक होने पर गलन जैसी बीमारियों का प्रकोप बढ जाता है।
  • खरपतवार व अन्य पोषक पौधों को उखाड कर नष्ट कर दें।
  • शुरुवाती समय मे माहू के प्रकोप से प्रभावित पौधों की टहनियों को धीरे से काटकर खेत से बाहर कर देना चाहिए तथा पीले ट्रैप का प्रयोग करना चाहिए।
  • खेतों में उपलब्ध कीटों के प्राकृतिक शुत्रओं(परभक्षी कीट) जैसे- का्रक्सीनेला, सिरफिड फलाई, ग्रीओन स्पी. व का्रइसोपरला आदि भी जैविक कीट नियन्त्रण में मदद करते हैं।
  • सरसों में माहू प्रबन्ध के लिए 4000-5000 क्राक्सीनेला भृंग प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
  • पौधों से चूसने वाले कीटों के नियन्त्रण के लिए वर्टीफायर एल (वरुणास्त्रा) 10-15 मिली. प्रति ली. तथा नीम कवच (1500 पीपीएम) 5 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से मिलाकर प्रयोग करें।
  • अन्य कीटों जैसे लार्वा (इल्ली) आदि के नियन्त्रण के लिए 10-15 मिली. (नागेस्त्रा) बवेरिया बेसियाना या 10 - 15 मिली. (कालीचक्र/देवास़्त्रा) मेटाराइजियम एनीसोप्ली प्रति ली. पानी की दर से फसलों पर छिडकाव कीटों का प्रकोप शुरु होते ही करें। आवश्यकता होने पर दोबारा छिडकाव करें ।
  • छाछया रोग, गलन अंगमारी तथा मृदुरोमिल असिता के प्रबन्धन के लिए 5-10 मिली. स्यूडोमोनास फल्यूरोसेंस (बैक्टवाईप) तथा उसके साथ 5-10 मिली. एमपिलोमाईसिस क्विसक्वैलिस प्रति ली. पानी की दर से मिलाकर शाम के समय खेत में छिडकाव करें।
  • तना गलन रोग से ग्रसित पौधे समय से पूर्व पक जाते है। उन पर सफेद गांठ (स्क्लरोशिया) बनने के पूर्व से खेत से उखाडकर बाहर निकालकर नष्ट कर दें।
  • पौधें के निचले भाग की 2-3 पत्तियों को तोडकर पशुओं के हरे चारे में प्रयोग कर लेना चाहिए जिससे हरे चारे के साथ रोग नियन्त्रण मे भी काफी मदद मिलती है।

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