देश में दूध के बंपर उत्पादन, स्किम्ड मिल्क पाउडर के बढ़ते स्टॉक से मुश्किल में डेयरी कंपनियां

स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) का उत्पादन खपत से अधिक रहने से भारतीय दुग्ध उद्योग के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। एसएमपी का भंडार मार्च तक बढ़कर 2 लाख टन पहुंच सकता है। दूसरी तरफ दुग्ध सहकारी इकाइयों के पास पहले ही 20 प्रतिशत से अधिक दूध की मात्रा आ रही है, लेकिन इन्हें एसएमपी में तब्दील करने की उनकी क्षमता पर्याप्त नहीं है। इसका नतीजा यह हुआ है कि किसानों को मिलने वाला खरीद मूल्य औसतन 20 प्रतिशत कम हो गया है। जल्द ही एसएमपी की खेप का निर्यात नहीं हुआ तो कीमतें और कम हो सकती हैं।

दुग्ध उद्योग की हालत खस्ता

सहकारी दुग्ध संस्थानों ने सरकार से एसएमपी खरीदने या निर्यात सब्सिडी देने की मांग की है। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार एसएमपी खरीद सकती है और इसे मदद योजना के तहत सार्क देशों को भेज सकती है। कुल मिलाकर दुग्ध उद्योग की हालत खस्ता है और जल्दी से कोई समाधान नहीं निकला तो दूध उत्पादकों को तगड़ी चोट पहुंच सकती है। हालात ऐसे ही रहे तो अगले सत्र में दूध उत्पादन पर बुरा असर पड़ सकता है और किसान इससे आहत होकर दुग्ध उद्योग से मुंह मोड़ सकते हैं।

गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ के एमडी आर एस सोढ़ी कहते हैं, ‘स्थिति से निपटने के लिए हमने सरकार से निर्यात सब्सिडी की मांग की है। सब्सिडी नहीं मिलने की स्थिति में हमने कम से कम 20,000 से 30,000 टन एसएमपी का भंडारण करने का आग्रह किया है। यह भंडार गरमी के मौसम में खप सकता है।’

निजी डेयरी कंपनियों ने अतिरिक्त दुग्ध खरीदना बंद किया

संगठित दुग्ध उत्पादन क्षेत्र से सहकारी इकाइयां 40-60 प्रतिशत तक दूध खरीदती हैं। वे 20 प्रतिशत तक अधिक दूध ले रही हैं और राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ये इकाइयां सर्दी में सामान्य मात्रा से 30 प्रतिशत तक अधिक दूध खरीद रही हैं। सोढ़ी ने कहा कि निजी इकाइयों ने दूध खरीदना बिल्कुल बंद कर दिया है क्योंकि उन्हें यह व्यावसायिक तौर पर फायदेमंद नहीं दिखाई देता है। पिछले एक महीने में घी की कीमतें भी प्रति टन 100 रुपये कम हो गई हैं।

कर्नाटक ने बिगाड़ा दुग्ध कंपनियों का खेल

कर्नाटक सरकार किसानों को 5 रुपये प्रति लीटर सब्सिडी देती है। कर्नाटक मिल्क फेडेरेशन (केएमएफ) को इस समय 72 लाख लीटर प्रति दिन दूध मिल रहा है, जबकि दूध की बिक्री 32 लाख लीटर प्रति दिन है। शेष 40 लाख लीटर प्रति दिन मात्रा बाजार में जिंस (एसएमपी) या लिक्विड मिल्क (दूध) के रूप में आता है। अतिरिक्त दूध की आवक से केएमएफ चेन्नई, मुंबई और हैदराबाद के बाजारों में दूध की आपूर्ति कर रहा है। जानकारों का कहना है कि पिछले साल केएमएफ ने किसानों को 23 रुपये प्रति लीटर का भुगतान किया था। केएमएफ को 5 रुपये प्रति लीटर सब्सिडी सरकार से मिली थी। हालांकि महाराष्ट्र में कारोबारी को उत्पाद बेचने के लिए केएमएफ से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। केएमएफ के लिए खरीद मूल्य 18 रुपये प्रति लीटर रह जाता है क्योंकि शेष रकम सब्सिडी के तौर पर मिल जाती है।

लागत से कम पर दूध बेचने पर मजबूर कारोबारी

दक्षिण भारत की एक अग्रणी निजी दुग्ध उत्पादक इकाई के प्रमुख ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘घबराहट में दूध कारोबारी उत्पादन लागत से कम कीमतों पर दूध बेच रहे हैं। अगर दूसरा देश भारत में लागत से कम कीमत पर अपने उत्पाद बेचता है तो हम उस स्थिति में विरोध जता सकते हैं, लेकिन यहां मामला कुछ और है। यहां केएमएफ विभिन्न राज्यों में दूध की आपूर्ति कर रहा है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इसे केंद्र सरकार की नजर में लाना और इसे रोकने के लिए विधेयक पारित करना जरूरी हो गया है।’

सोढ़ी ने कहा कि केएमएफ सरकारी सब्सिडी के कारण एसएमपी दूसरी इकाइयों के मुकाबले 50 रुपये प्रति किलोग्राम कम कीमतों पर बेच सकता है। उन्होंने कहा कि इससे दूसरी इकाइयों को भी इसी कीमत पर एसएमपी बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। जहां तक दूध को एसएमपी में बदलने की बात है तो केएमएफ ने पिछले 12 सालों में इस दिशा में क्षमता विस्तार नहीं किया है। हालांकि अब यह बेंगलूरु के निकट रामनगर में नया एसएमपी संयंत्र शुरू कर रहा है। यह एसएमपी भंडार पिछले महीने के 16,500 टन से कम कर 15,000 टन करने में सफल रहा है।

कर्नाटक मिल्क फेडरेशन खाली करना चाहता है एसएमपी का भंडार

केएमएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वह इस साल जून तक एसएमपी भंडार खाली करना चाहता है। उत्तर भारत और महाराष्ट्र में निजी दुग्ध एवं जिंस कंपनियों ने दूध खरीदना कम कर दिया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की एक निजी दुग्ध उत्पादक कंपनी ने कहा कि बाजार एसएमपी से पटा पड़ा है, जिससे घरेलू बाजार में कीमतें कम होकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम तक रह गई हैं। यानी इनमें 30 प्रतिशत तक कमी आ गई है। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमत 115 रुपये प्रति किलोग्राम है, जिससे निर्यात का विकल्प भी नहीं रह गया है।

 

देश में दो हजार करोड़ मूल्य का है एसएमपी भंडार

फिलहाल जीसीएमएमएफ किसानों को पिछले साल का खरीद मूल्य दे रहा है और इसे कम नहीं किया गया है। आंध्र प्रदेश में भी कीमत स्थिर है। हालांकि निजी दुग्ध उत्पादक इकाइयों से लैस उत्तर प्रदेश में सहकारी समितियों ने खरीदारी 900,000 लीटर प्रति दिन से कम कर 500,000 लीटर प्रति दिन कर दी है। देश में एसएमपी भंडार का मूल्य 1,600 करोड़ रुपये से 2,000 करोड़ रुपये के बीच है। एक निजी दुग्ध उत्पादक कंपनी ने कहा, ‘अगर सरकार कुछ मात्रा खरीदती है तो स्थिति में सुधार हो सकता है।’

(साभार-बिजनेस स्टैंडर्ड)

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