भूमि में जिंक की कमी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याएँ

भूमि में पोषक तत्वों की कमी और कृषि उत्पादों की गुणवत्ता में चोली दामन का संबंध देखा जाता है। उल्लेखनीय है कि खेत की मिट्टी में जिन भी पोषक तत्वों की कमी होगी, निश्चित रुप से उन्हीं पोषक तत्वों की कमी उस खेत से प्राप्त खाद्यान्नों, सब्जी, फल एवं अन्य सभी कृषि उत्पादों में होना तय है। अर्थात् माटी अगर दमदार होगी यानी उसमे पौधों के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में उपलब्ध होंगे तो बेशक उस खेत से प्राप्त सभी कृषि उत्पाद पौष्टिक (प्रोटीन, विटामिन्स और खनिज तत्वों से भरपूर) एवं सुस्वादु होंगे। यह एक निर्विवाद सत्य है। बताते चलें भारतीय मिट्टियों में जिंक की व्यापक कमी है जिसका न केवल फसल उत्पादकता पर कुप्रभाव पड़ रहा है बल्कि उत्पाद की गुणवत्ता भी कुप्रभावित हो रही है। भारत जैसे विकासशील देशांे में जहाँ एक ओर भूमि में जिंक की विशेष कमी और दूसरी ओर कृषि उत्पादों में जिंक की कमी और इससे प्रभावित मानव स्वास्थ्य की समस्या के विषय में लोगों की अनभिज्ञता के कारण दस्त और निमोनिया जैसी बीमारियों के कारण शिशुओं की मृत्यु दर सबसे ज्यादा आँकी गयी है। ऐसा अनुमान है कि विश्व की एक तिहाई जनसंख्या भोजन में जिंक की कमी की समस्या से प्रभावित है। मानव पोषण के लिए जिंक एक आवश्यक एवं महत्वपूर्ण पोषक तत्व माना गया है। जिंक की कमी से विश्व की 16 प्रतिशत जनसंख्या का श्वसन तंत्र, 19 प्रतिशत का स्वास्थ्य मलेरिया के कारण और 10 प्रतिशत का दस्त की समस्या के कारण गड़बड़ाया है। जिंक की कमी से होने वाली दस्त की बीमारी के कारण अनुमानतः 8 लाख लोगों खासकर शिशुओं की मृत्यु का कारण बन जाती है। शिशुओं और बच्चों में बीमारी के प्रति रोग-रोधक क्षमता काफी कम हो जाती है। परिणामस्वरुप, बच्चे रोग के संक्रमण के प्रति बहुत ही संवेदनशील हो जाते हैं। बच्चों का पालन पोषण करने वाली बहुसंख्य भारतीय माताओं को तो इस बात की जानकारी ही नहीं है।

          भारतीय मिट्टियों में जिंक की व्यापक कमी के कारण कृषि उत्पादों में जिंक की मात्रा अपर्याप्त रह जाती है जो कि कुपोषण का एक बड़ा कारण बन जाती है। जिंक की कमी के कारण हमारी भोजन सामग्री में जिंक की कमी के अलावा अन्य पोषक गुणों (प्रोटीन, विटामिन्स और खनिज लवण आदि) में भी कमी आ जाती है। नतीजतन जिंक की कमी के कारण बच्चों का शारीरिक विकास यथोचित रुप से नहीं हो पाता है। भारत जैसे विकासशील देश में हमारे भोजन का मुख्य स्रोत अनाज और दालें हैं, जिससे हमारे पोषण के लिए ऊर्जा, प्रोटीन और खनिज तत्व प्राप्त होते हैं। चूंकि इन क्षेत्रों में जिंक की व्यापक कमी है, अतः यहाँ के कृषि उत्पाद में जिंक की कमी होना स्वाभाविक है। जिससे मानव ही नहीं पशुओं का भी स्वास्थ्य कुप्रभावित हो रहा है। भारत में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि जिन क्षेत्र की मिट्टियों में जिंक की कमी थी, उन क्षेत्रों से पैदा किए गए खाद्यान्नों में जिंक की कमी के कारण मानव रक्त में भी जिंक का स्तर कम पाया गया। मिट्टी में जिंक की कमी जिंक सल्फेट के प्रयोग द्वारा दूर की जा सकती है। इससे कृषि उत्पादों में जिंक की मात्रा बढ़ जाती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होना चाहिए कि जिंक के बिना जीवन संभव नहीं है। जिंक हमारे शरीर के सभी अंगों में पाया जाता है। जिंक मानव शरीर में कोशिकाओं के विकास के लिए आवश्यक है। यह चयापचय संबंधी विभिन्न क्रियाओं को संपादित करने में मदद करता है। इंसुलिन की गतिविधि, रोगों के प्रति प्रतिरक्षात्मक क्षमता का विकास, शारीरिक विकास, गर्भ काल में महिलाओं और गर्भ में पलने वाले शिशुओं के विकास के लिए विशेष महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस अवधि में विकास के लिए कोशिकाओं का विभाजन बहुत तेजी से होता है और जिंक शिशुओं व बच्चों के शारीरिक विकास (लंबाई व वजन में वृद्धि एवं हड्डियों का विकास) में सक्रिय भूमिका निभाता है। जिंक हमारे स्वस्थ जीवन के लिए परमावश्यक है। सभी विटामिनों और खनिज लवणों में जिंक हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता पर सबसे कारगर असर डालता है। यह हमें रोगों के संक्रमण से बचाता है। सामान्यरुप से ठंड से बचाने में भी जिंक सक्षम पाया गया है।

          मानव आहार में जिंक की कमी से प्रभावित व्यक्ति में कई तरह के लक्षण पाये जाते हैं जिसकी पुष्टि आसानी से की जा सकती है। पुरुषों में जिंक की कमी के आम लक्षण- जैसे बालों का झड़ना, धीमी गति से घाव भरना, नाखूनों के नीचे सफेद धब्बे हो जाना, एलर्जी, प्रतिरक्षात्मक क्षमता में कमी, चपापचय प्रणाली का कमजोर होना, त्वचा आदि रोगों की समस्या। मिचली आना, कमर दर्द, मांसपेशियों का असंतुलन आदि जिंक की कमी के कारण हो सकता है। इस तत्व का सबसे बड़ा महत्व चित्त की एकाग्रता के रुप में आँका गया है। यहाँ यह उल्लेख महत्वपूर्ण है कि वैसे तो हम सभी के लिए जिंक नितांत आवश्यक है, परंतु पुरुषों के लिए इसकी आवश्यकता महिलाओं की तुलना में अधिक होती है। शिशुओं की मृत्युदर कम करने के आशय से संयुक्त राज्य, यूथोपिया एवं भारत की सरकारों ने यूनीसेफ की मदद से “शिशु जीवन रक्षा” हेतु एक अनूठा कार्यक्रम तैयार किया। जिसके द्वारा रोकी जा सकने वाली बीमारियों से नवजात शिशुओं, बच्चों एवं माताओं को मौत से बचाया जा सके। इसके तहत एक विशिष्ट कार्य योजना तैयार की गयी जिसमें पब्लिक-प्राइवेट सहभागिता की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। इस पुनीत कार्यक्रम में सरकारों, गैर सरकारी संगठनों,और दान दाताओं का संयुक्त सहयोग सुनिश्चित किया गया है जिसके अंतर्गत प्रति वर्ष दस्त एवं निमोनिया से मरने वाले 20 लाख शिशुओं की मृत्यु में कमी का लक्ष्य रखा गया। ज्ञातव्य है कि 5 वर्ष से कम उम्र वाले शिशुओं की होने वाली कुल मृत्यु में 29 प्रतिशत मृत्यु दस्त एवं निमोनिया से हो जाती है जो कि प्रति वर्ष लगभग 20 लाख से अधिक आँकी गयी है। उल्लेखनीय है कि ऐसी होने वाली कुल मृत्यु में 75 प्रतिशत हिस्सा 15 देशों का है जिसमंे 5 देशों का स्थान सर्वोपरि हंै, जिसमंे भारत, नाइजीरिया, कांगो, पाकिस्तान और यूथोपिया जैसे देश सम्मिलित हैं। निस्संदेह, यदि समय रहते सावधानी बरती जाए तो दस्त एवं निमोनिया जैसे रोगों पर काबू पाया जा सकता है। निम्न परासारिता मौखिक पुनर्जलीकरण लवण (लो-ओस्मोलरिटी ओरल साल्ट्स) और जिंक उपचार से 90 प्रतिशत दस्त से होने वाली मृत्यु पर बहुत ही कम खर्च से बखूबी नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके बावजूद गरीब देशों के 5 प्रतिशत से भी कम बच्चों को संस्तुति के अनुसार पूर्ण उपचार मिल पाता है और मात्र 23 प्रतिशत शिशुओं को निमोनिया के उपचार हेतु एंटीबायोटिक उपचार मिल पाता है। ऐसा अनुभव किया गया है कि यदि सरकारों की इच्छाशक्ति हो, सक्षम नियामक तंत्र हो और इसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त संसाधन हों, तो इस समस्या से सफलतापूर्वक निपटा जा सकता है।  यद्यपि इसमें पब्लिक सेक्टर की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगी, फिर भी कोई एक वर्ग अपने स्वयं के संसाधनों से इसे सफलतापूर्वक क्रियान्वित नहीं कर सकता है। चूंकि दस्त का संक्रमण बहुत तेजी से होता है और तुरंत सही उपचार न मिलने की वजह से प्राणघातक हो जाता है, अतः इस पर समय रहते नियंत्रण पाने के लिए स्थानीय निजी संस्थाओं का योगदान सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। अतः इन संस्थाओं को बढ़-चढ़ कर अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। जिंक की न्यूनतम मात्रा 12 से 15 मिलीग्राम प्रतिदिन आँकी गयी है। यह आपके स्वास्थ्य, अपने संतुलन और हार्मोनल प्रोस्टेट के सुचारु रुप से क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है अन्यथा 15 मिलीग्राम से अधिक मात्रा से हानिकारक प्रभाव होने की संभावना रहती है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे दैनिक आहर में जिंक की पर्याप्त मात्रा बनी रहे। जिंक की सही मात्रा के लिए हमंे प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों, डेयरी उत्पादों सहित अनाज, पोल्ट्री और मांस आदि पूरक आहार के रुप में लेना चाहिए ताकि जिंक की आवश्यक खुराक प्राप्त होती रहे। इसके लिए हमें खुराक का सही चयन करने के लिए डाॅक्टर की राय लेना चाहिए क्योंकि इस तत्व की बहुत अधिक मात्रा भी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है।

डाॅ. के. एन. तिवारी

वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक

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