जल संरक्षण का महत्व

जल संकट आज भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। जिस भारत में 70 प्रतिशत हिस्सा पानी से घिरा हो वहाँ आज स्वच्छ जल उपलब्ध न हो पाना विकट समस्या है, भारत में तीव्र नगरीकरण से तालाब और झीलों जैसे परम्परागत जल स्रोत सूख गए हैं। भारत में वर्तमान में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 2,000 घनमीटर है लेकिन यदि परिस्थितियाँ इसी प्रकार रहीं तो अगले 20-25 वर्षों में जल की यह उपलब्धता घटकर 1,500 घनमीटर रह जायेगी. जल की उपलब्धता का 1,680 घनमीटर से कम रह जाने का अर्थ है पीने के पानी से लेकर अन्य दैनिक उपयोग तक के लिए जल की कमी हो जाना। इसी के साथ सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता न रहने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो जायेगा. मनुष्य सहित पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जंतु एवं वनस्पति का जीवन जल पर ही निर्भर है. जल का कोई विकल्प नहीं है, यह प्रकृति से प्राप्त निःशुल्क उपहार है, परंतु बढ़ती आबादी, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और उपलब्ध संसाधनों के प्रति लापरवाही ने मनुष्य के सामने जल का संकट खड़ा कर दिया है, यह 21वीं सदी के भारत के मानव के लिए एक बड़ी चुनौती है। वर्तमान में जल संकट बहुत गहरा है, आज पानी का मूल्य बदल गया है और जल एक महत्वपूर्ण व मूल्यवान वस्तु बन चुकी है। शुद्ध जल जहाँ एक ओर अमृत है, वहीं पर दूषित जल विष और महामारी का आधार, जल संसाधन, संरक्षण और संवर्धन आज की आवश्यकता है, जिसमें जनता का सहयोग अपेक्षित है। जल न्यूनता या सूखा एवं जल आधिक्य या बाढ़ दोनों ही समस्याएं जल संकट के दो पहलू हैं, जल संकट की निरंतर अभिवृद्धि हो रही है, भूमिगत जल का संतृप्त तल गहराई की ओर खिसकने से परंपरागत जल स्रोत सूख रहे हैं। पृथ्वी पर कुल उपलब्ध जल लगभग 01 अरब 36 करोड़ 60 लाख घन किमी. है, परंतु उसमें से 96.5 प्रतिशत जल समुद्री है जो खारा है, यह खारा जल समुद्री जीवों और वनस्पतियों के अतिरिक्त मानव धरातलीय वनस्पति तथा जीवों के लिए अनुपयोगी है। शेष 3.5 प्रतिशत जल मीठा है, किंतु इसका 24 लाख घन किमी. हिस्सा 600 मीटर गहराई में भूमिगत जल के रुप में विद्यमान है तथा लगभग 5.00 लाख घन किलोमीटर जल गंदा व प्रदूषित हो चुका है। इस प्रकार पृथ्वी पर उपस्थित कुल जल का मात्र 01 प्रतिशत ही उपयोगी है। हम एक फीसदी जल पर दुनिया की 06 अरब आबादी समेत सारे सजीव और वनस्पतियाँ सभी निर्भर हैं। इस मीठे जल से सिंचाई, कृषि कार्य तथा तमाम उद्योग संचालित होते हैं, जल जीवन के लिए अमृत है। प्रकृति के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। यह नियत मात्रा में उपलब्ध नहीं है इसका दुरुपयोग इसे दुर्लभ बना रहा है। आज भारत सहित दुनिया के अनेक देश जल संकट का सामना कर रहे हैं। भारत में विश्व के कुल मीठे जल की मात्रा 3.5 प्रतिशत मौजूद है जिसका 89 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में उपयोग किया जाता है। जल प्रबंधन की शुरुआत कृषि क्षेत्र से करनी चाहिए क्योंकि सर्वाधिक मात्रा में कृषि कार्यों में ही जल का उपयोग किया जाता है तथा सिंचाई में जल का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या है, जनमानस में धारणा है अधिक पानी, अधिक उपज, जो कि गलत है, क्योंकि फसलों के उत्पादन में सिंचाई का योगदान 15-16 प्रतिशत होता है। फसल के लिए भरपूर पानी का मतलब मात्र मिट्टी में पर्याप्त नमी ही होती है परंतु वर्तमान कृषि पद्धति में सिंचाई का अंधा-धुंध इस्तेमाल किया जा रहा है। धरती के गर्भ से पानी की आखिरी बूँद भी खींचने की कवायद की जा रही है। देश में हरित क्रांति के बाद से कृषि के जरिये जल संकट का मार्ग प्रशस्त हुआ है। बूँद-बूँद सिंचाई बौछार (फव्वारा तकनीकी) तथा खेतों के समतलीकरण से सिंचाई में जल का दुरुपयोग रोका जा सकता है। फसलों के जीवन रक्षक या पूरक सिंचाई देकर उपज को दुगुना किया जा सकता है। जल उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए पौधों को संतुलित पोषक तत्वों को प्रबंध करने की आवश्यकता है, जल की सतत् आपूर्ति के लिए आवश्यक है कि भूमिगत जल का पुनर्भरण किया जाए, भूमिगत जल के पुर्नभरण की आसान और सस्ती तकनीकों से देश के किसान अंजान नहीं है, उन्हें प्रोत्साहन की जरुरत है। किसान को बताया जाये कि जहाँ पानी बरस कर भूमि पर गिरे उसे वहीं यथासंभव रोका जाये। ढाल के विपरीत जुताई तथा खेतों के मेंढ़ बंदी से पानी रुकता है। खेतों के किनारे फलदार वृक्ष लगाने चाहिए, छोटे-बड़े सभी कृषि क्षेत्रों पर क्षेत्रफल के हिसाब से तालाब बनाने जरुरी हैं। ग्राम स्तर पर बड़े तालाबों का निर्माण गाँव के निस्तार के लिए जल उपलब्ध कराता है। साथ ही भू-गर्भ जल स्तर को बढ़ाता है, देश की मानसूनी वर्षा का लगभग 75 फीसदी जल भूमिगत जल के पुनर्भरण के लिए उपलब्ध है देश के विभिन्न परिस्थितिकीय क्षेत्रों के अनुसार लगभग 3 करोड़ हैक्टेयर मीटर जल का संग्रहण किया जा सकता है। रासायनिक खेती की बजाये जैविक खेती पद्धति अपना कर कृषि में जल का अपव्यय रोका जा सकता है। जल संकट के कई कारण हो सकते हैं। जल संकट के कुछ कारण निम्नांकित हैं -

  • जनसंख्या में वृद्धि।
  • औसत वर्षा में गिरावट आना।
  • प्रति व्यक्ति जल खपत में वृद्धि।
  • भू-जल स्तर में निरन्तर गिरावट आना।
  • जल का आवश्यकता से अधिक दोहन।
  • लोगों में जागरुकता का अभाव।
  • खारेपन की समस्या।

जल संकट को दूर करने के कुछ उपाय 

  • अत्यधिक जल दोहन रोकने के लिए कड़े कानून बनाये जायें जिनमें सजा का प्रावधान हो।
  • तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण एवं परस्पर विवादों को समाप्त करके इस समस्या का निदान किया जाये।
  • समुद्री जल का शोधन कर कृषि कार्यों में उपयोग किया जा सके, ऐसी विधियों की खोज की आवश्यकता है।
  • कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जाये जिसके तहत् नदियों के मीठे जल का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके।
  • भूगर्भीय जल भण्डार को रिचार्ज करने के अलावा छत से बरसाती पानी को सीधे किसी टैंक में भी जमा किया जा सकता है।
  • बड़े संसाधनों के परिसर की दीवार के पास बड़ी नालियाँ बनाकर पानी की जमीन पर उतारा जा सकता है। इसी प्रकार कुओं में भी पाइप के माध्यम से बरसाती पानी को उतारा जा सकता है।
  • बरसाती पानी को एक गड्ढ़े के जरिये सीधे धरती के भूगर्भीय जल भण्डारण में उतारा जा सकता है।

उपरोक्त जल संरक्षण से कुछ सीमा तक जल संकट की समस्या का निराकरण किया जा सकता है। जल को प्रदूषण से मुक्त रखने तथा इसकी उपलब्धता को बनाये रखने के कुछ और भी उपाय किए जा सकते हैं जो निम्नानुसार हैं-

  • रेन वाटर हारवेस्टिंग को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
  • मकानों की छत के बरसाती पानी को ट्यूबबैल के पास उतारने से ट्यूबबैल रिचार्ज किया जा सकता है।
  • शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी अपने मकानों की छत से गिरने वाले वर्षों के पानी को खुले में रेन वाटर कैच पिट बनाकर जल को भूमि में समाहित कर भूमि का जल स्तर बढ़ा सकते हैं।
  • पोखरों इत्यादि में एकत्रित जल से सिंचाई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे भूमिगत जल का उपयोग कम हो।
  • शहरों में प्रत्येक आवास के लिए रिचार्ज कूपों का निर्माण अवष्य किया जाना चाहिए, जिससे वर्षा का पानी नालों में न बहकर भूमिगत हो जाये।
  • तालाबों, पोखरों के किनारे वृक्ष लगाने की पुरानी परम्परा को पुनजीर्वित किया जाना चाहिए।
  • ऊँचे स्थानों, बाँधों इत्यादि के पास गहरे गड्ढ़े खोदे जाने चाहिए, जिससे उनमें वर्षा जल एकत्रित हो जाये और बहकर जाने वाली मिट्टी को अन्यत्र जाने से रोका जा सके।
  • कृषि भूमि में मृदा की नमी को बनाये रखने के लिए हरित खाद तथा उचित फसल चक्र अपनाया जाना चाहिए। कार्बनिक अवशिष्टों को प्रयोग कर इस नमी को बचाया जा सकता है।
  • वर्षा जल को संरक्षित करने के लिए शहरी मकानों में आवश्यक रुप से वाटर टैंक लगाए जाने चाहिए। इस जल का उपयोग अन्य घरेलू जरुरतों में किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष यह है कि जल परमात्मा का प्रसाद है, इसका संरक्षण करना वर्तमान समय की आवश्यकता है। इसका संरक्षण एवं सही उपयोग किया जाना भारत के भविष्य के सतत् विकास हेतु आवश्यक है। जब तक जल के महत्व का बोध हम सभी के मन में नहीं होगा तब तक सैद्धान्तिक स्तर पर स्थिति में सुधार संभव नहीं है। इसके लिए लोगों को जल को सुरक्षित करने के लिए सही प्रबन्धन के अनुसार कार्य करना होगा। यदि वक्त रहते जल संरक्षण पर ध्यान न दिया तो हो सकता है कि जल के अभाव में अगला विश्वयुद्ध जल के लिए हो तो इसमें आश्चर्य नहीं और हम सब इसके लिए जिम्मेदार होंगे।

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