रोग मुक्त के साथ गरीब मुक्त कर रहा आयुर्वेद

कौन कहता है कि खेती अब घाटे का सौदा है?  घाटे का सौदा उसी के लिए हो सकता है जो मेहनत करने से कतराता है। हमारे पास न जाने कितने ऐसे उदाहरण है जो सिद्ध कर देंगे कि खेती एक व्यापार है जिसके द्वारा लाखों करोड़ों रूपये कमाया जा सकता है। देश में अनेकों ऐसे किसान है जो अपने विवेक और पराक्रम से लाखों रूपये कमा रहे हैं।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों के कई ऐसे छोटे समूह हैं जो प्रति एकड़ 3 लाख या उससे अधिक की आय कमा रहे हैं। यह आंकड़ा छोटे व सीमान्त किसानों की वास्तविक परिप्रेक्ष्य से अलग है। भारत में ज्यादातर किसान गेहूं और चावल की खेती से महज 30,000 रुपये प्रति एकड़ ही कमाते हैं लेकिन इसके उलट यह किसान समूह प्रति एकड़ में 3 लाख रुपये कमा रहा है।

आईये आपको बताते हैं कि कैसे प्रति एकड़ लाखों की कमाई की जा सकती है। जड़ी-बूटियों और सुगंधित पौधों की खेती द्वारा लाखों रूपया कमाना संभव है क्योंकि इसकी मांग बड़े पैमाने पर की जा रही है। जड़ी-बूटियों और सुगंधित पौधों का उपयोग आयुर्वेदिक दवा और सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में किया जाता है। इन उत्पादों को डाबर, हिमालय, पतंजलि और प्राकृतिक उपचार करने वाली कई कंपनियों द्वारा खरीदा जाता है। यही इस खेती की कमाई का मुख्य तत्व है।

कुछ विदेशी जड़ी बूटियों को भी अपने देश में उगाकर भारी मुनाफा कमाया जा सकता है। आजकल आयुर्वेद की होड़ मची है। टीवी विज्ञापन से लेकर कथा प्रवचन तक आयुर्वेद की बात की जा रही है। इन जड़ी बूटियों और सुगंधित पौधों की उपयोगिता को शहरी उपभोक्ता भी समझने लगे हैं। इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए कुछ किसान इसकी खेती कर रहे हैं। आप भी इन किसानों की तरह जड़ी-बूटियों और सुगंधित पौधों की खेती कर लाखों कमा सकते हैं। 

वर्तमान में हर्बल उत्पादों का 50,000 करोड़ रुपये का बाजार है जो प्रति वर्ष 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जड़ी बूटियों और सुगंधित पौधों को समर्पित कृषि जोत अभी भी बहुत कम है। वर्तमान समय में कुल 1058.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में से 6.34 लाख हेक्टेयर भूमि में जड़ी-बूटियों और सुगंधित पौधों की खेती की जा रही है। लेकिन बढ़ती मांग के चलते इसमें 10 प्रतिशत की सालाना बढ़ोत्तरी हो रही है।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की तरह जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले के खेलानी गांव के भारत भूषण ने लैवेंडर की खेती करने के लिए अपनी 2 एकड़ जमीन में मक्के की खेती कर रहे थे लेकिन ज्यादा मुनाफा न होता देख उन्होंने लैवेंडर की खेती किया। लैवेंडर ने उन्हें ज्यादा मुनाफा दिया। इस नवंबर तक वह और 10 एकड़ जमीन में लैवेंडर की खेती करने जा रहे हैं। भारत भूषण ने बताया कि मैंने 2000 में पहली बार लैवेंडर की खेती किया जिससे मुझे चार गुना रिटर्न मिला।  

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के सांगला गांव के विद्याकरण ने भी दो एकड़ जमीन में जड़ी-बूटियों की खेती किया है। वह इन फसलों के बड़े फायदों को बताते हुए कहते हैं कि जड़ी बूटियों को बहुत अधिक पानी और उर्वरकों की जरूरत नहीं होती है और इसका दाम भी मुझे ज्यादा मिलता है। 

कुछ कंपनियां किसानों से अनुबंध पर खेती कराती हैं जिससे कंपनी और किसान दोनों को लाभ मिलता है। डाबर कंपनी राजस्थान के बाड़मेर जिले में शंकपुष्पी जैसे औषधीय पौधों की खेती कराती है। जो कंपनियां इन जड़ी बूटियों और सुगंधित पौधों को खरीदती हैं वे समान रूप से इसके लिए उत्साही होती हैं।

प्राकृतिक उपचार के निदेशक अमित अग्रवाल कहते हैं कि अतीश, कुथ, कुट्टी जैसी कुछ उच्च मूल्य वाली जड़ी बूटी वर्तमान में आपूर्ति की कमी के कारण अधिक लाभदायक हैं। वह कहते हैं कि औसतन एक किसान जड़ी बूटी से 60,000 रुपये प्रति एकड़ कमा सकता है। प्राकृतिक उपचार 1,043 एकड़ भूमि पर जड़ी बूटियों की अनुबंध खेती कर रहा है।

 

पतंजलि के सीईओ आचार्य बालकृष्ण का कहना है कि हमारी कंपनी किसानों को 40,000 एकड़ जमीन पर जड़ी बूटियों की खेती करने में मदद कर रही है। कुट्टी, शतावरी, और चिरायत सर्वश्रेष्ठ कमाई करने वालों की सूची में सबसे ऊपर हैं। उनका कहना है कि भारत के पास इस व्यवसाय को बढ़ाने की काफी संभावना है, क्योंकि चीन में इसका उत्पादन कम है और उच्च वैश्विक और घरेलू मांग ज्यादा है।

डाबर इंडिया सीएसआर के प्रमुख ए सुधाकर के मुताबिक, 2017-18 में, डाबर ने अपने बायो-रिसोर्सेज डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत औषधीय जड़ी-बूटी की खेती में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी किया है। डाबर कंपनी 2,400 किसान परिवारों के साथ 5,000 एकड़ से ज्यादा जमीन में जड़ी-बूटियों की खेती करा रही है।  

हिमालय कंपनी के प्रवक्ता का कहना है कि हिमालय ड्रग कंपनी 800 से ज्यादा किसानों के साथ 3,500 एकड़ जमीन में काम कर रही है। जम्मू में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन, लैवेंडर और सुगंधित पौधों जैसे रोसमेरी, जीरेनियम और क्लैरी सेज को बढ़ावा दे रहा है।

अगर यह कहा जाय कि आयुर्वेद रोग मुक्त करने के साथ ही किसानों को गरीब मुक्त भी कर रहा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

 

लेखक
विपिन मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार, फसल क्रांति

 

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