“सक्षम किसान - समृद्ध भारत” मुद्दे, चुनौतियाँ और रणनीति

गत वर्षों की तुलना में ऐसा तो कहा ही जा सकता है कि आज देश का कृषि-उत्पादन रिकाॅर्ड स्तर पर है। विदित हो कि वर्ष 2016-17 में लगभग 27 करोड़ 50 लाख टन खाद्यान्न उत्पादन के साथ ही 30 करोड़ टन फल व सब्जियों का ऐतिहासिक उत्पादन हुआ। दुग्ध उत्पादन में भी सार्थक वृद्धि हुई है। इसके बावजूद देश के किसानों के हालात अच्छे नहीं हैं। बताते चलें, छोटी होती जोतें, लगातार एक ही तरह के फसल चक्र अपनाने से खरपतवार, कीड़े, बीमारी आदि की बढ़ती समस्या और उनके नियंत्रण के लिए पीड़कनाशियों के बढ़ते प्रयोग के कारण खेती का बढ़ता खर्च, कृषि निवेशों की वर्षानुवर्ष बढ़ती कीमतें, ऊपर से मौसम की मार एवं बाजार मूल्यों में असंतुलन आदि कृषि क्षेत्र की प्रमुख समस्याएँ हैं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं के खस्ता हालात के कारण किसान परेशान तो हंै ही, साथ ही इन बदतर सेवाओं के बावजूद इन पर लगातार बढ़ते खर्च से किसान का आहत होना, उसकी नियति सी बन गयी है। सरकारें बदलती रहीं, परंतु इन दो महत्वपूर्ण ग्रामीण सेवाओं में कोई सार्थक परिवर्तन नजर नहीं आता। अगर कुछ भी नजर आता है, तो वह है सरकारी एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार और उनकी निष्क्रियता। चूँकि हम किसानों की समृद्धि की चर्चा कर रहें हैं अतः हमें किसान से जुड़ी अन्य समस्याओं पर चर्चा करना जरुरी हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रामीण अस्पतालों एवं विद्यालयों में संसाधनों की कमी के साथ ही डाक्टरों और शिक्षकों की कमी के मद्देनजर गुणवत्तापूर्ण सेवा एवं स्टाफ की सत्यनिष्ठा की चर्चा व्यर्थ है। फिर भी, हद तो तब हो जाती है, जब गाँवों के गंभीर मरीज एवं प्रसूता का एंबुलेंस के अभाव में रास्ते में ही काम तमाम हो जाता है।
देश की लगभग 60 फीसदी जनसंख्या गाँवों में बसती है। गाँधी जी का कहना था कि “भारत के विकास का रास्ता गाँवो से निकलेगा”। परंतु पूर्ववर्ती सरकारों की “गरीबी हटाओ” के चतुर्दिक शोरगुल से डरकर गाँव का युवक जो गाँवों के विकास की रीढ़ था, वह तो शहर की ओर भागा। आजादी के दशकों बाद उसे ग्रामीण क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योग नजर नहीं आए। रोजगार के अवसर थे नहीं। बढ़ती जनसंख्या के अनवरत् बढ़ते दबाव के कारण छोटी होती जोतों के कारण भी युवकों का गाँवों में रुकना निरर्थक ही साबित होता। पूर्ववर्ती सरकार ने तो दूसरी हरित क्रान्ति तक की बातें की। परंतु यह नहीं सोचा कि क्या गाँव में रह रहे बचे खुचे अधेड़ व 60-80 साल के बूढ़े जो दवा के अभाव में तकिया के नीचे थर्मामीटर रखकर किसी अनहोनी की चिंता में सोते हैं, उनसे दूसरी हरित क्रान्ति की परिकल्पना कैसे की जा सकती है?
बजट 2018 मुख्य रुप से कृषि एवं किसान कल्याण विषयों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता तथा माननीय प्रधानमंत्री जी के 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के संकल्प को परिलक्षित करता है। ज्ञातव्य है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का वर्ष 2017-18 का बजटीय आवंटन रु. 51,576 करोड़ था, जिसे इस वर्ष बढ़ाकर रु. 58,080 करोड़ कर दिया गया है। यहाँ यह बताना जरुरी है कि यदि कांग्रेस सरकार के वर्ष 2009 से 2014 तक के कृषि-बजट पर नजर डालें तो यह रु. 1,21,082 करोड़ था जो कि मोदी सरकार के 5 वर्षों (2014-19) में बढ़कर रु. 2,11,694 करोड़ हो गया है। यह 74.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नीम लेपित यूरिया, प्रधान मंत्री सिंचाई योजना, प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, कौशल विकास योजना, मुद्रा बैंक, महिला सशक्तीकरण के लिए ढेर सारी योजनाएँ, कृषि यंत्रीकरण, कृषि विस्तार उपमिशन, कृषि विपणन, वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास, डेयरी विकास, नीली क्रांति आदि। सरकार जहाँ विभिन्न फसलों की उत्पादकता तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयासरत है, वहीं किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य मिल सके, इसके लिए भी कटिबद्ध है। लंबे समय से अटकी किसानों की इस माँग को पूरा करने के लिए सरकार ने रबी 2018-19 से विभिन्न कृषि जिंसों पर किसानों को उनके उत्पाद का कृषि लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने का ऐलान किया है। सरकार जहाँ विभिन्न फसलों की उत्पादकता तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयासरत है, वहीं किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य मिल सके, इसके लिए भी कटिबद्ध है। परंतु बजट में इसके लिए कितनी राशि का आवंटन किया जाएगा, इसकी बात नहीं की गई, जिसकी वजह से सरकार के इस कदम पर सवाल उठ रहे हैं। यद्यपि सरकार के प्रयास से विगत 4 वर्षों में दाल, तिलहन, धान, गेहूँ जैसी फसलों की खरीददारी में वृद्धि हुई है, इसे नकारा नहीं जा सकता है, परंतु यह वृद्धि आशा के अनुरुप नहीं है। हाँ, वित्त मंत्री ने समर्थन मूल्य पर खरीदी न होने पर चिंता व्यक्त करते हुए यह जरुर कहा कि यदि बाजार में दाम एमएसपी से कम हों तो सरकार या तो एमएसपी पर खरीद करे या किसी अन्य व्यवस्था के अंतर्गत किसान को पूरी एमएसपी दिलाने की व्यवस्था करे। इस दिशा में केन्द्र सरकार नीति आयोग एवं राज्य सरकारों के साथ चर्चा कर पुख्ता व्यवस्था करेगा, जिससे किसानों को उनकी उपज का उचित दाम मिल सके, ऐसा कहा गया है।
आज किसान परेशान जरुर है, इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु यहाँ यह प्रश्न उठना भी न्यायसंगत होगा कि क्या कल किसान इससे ज्यादा खुशहाल था। यहाँ यह बताना भी ज़रुरी होगा कि राजनीतिक दल विरोध का तड़का लगाकर किसान की असंतुष्टि की पुष्टि करने में जुटे हुए हैं और इसमें सफल हो रहे हैं या नहीं, यह तो समय बताएगा। परंतु किसान आंदोलित हैं, ऐसा दिखाई दे रहा है। ऐसा हम सभी ने देखा कि महाराष्ट्र का हाल का किसान आंदोलन तो पूरी तरह से लाल झंडे से पटा पड़ा था। यह न केवल विचारणीय है बल्कि किसानों के साथ ही हम सबके लिए चिंता का विषय है। चूँकि मोदी सरकार से किसानों को असीमित अपेक्षाएं थीं, आज भी हैं और ऐसा लगता है कि किसानों को उनसे न केवल आशा है बल्कि किसानों का विश्वास आज भी उन्हें हासिल है। अतः अच्छा होता कि प्रधान मंत्री की महत्वाकांक्षी योजनाओं को सरकारी एवं प्रशानिक तंत्र द्वारा किसानों के हित में पूरी मुस्तैदी और पूरी ईमानदारी से ससमय, सही तरीके से क्रियान्वित किया जाता। बहुत सारी योजनाओं की जानकारी आज तक किसानों नहीं है। विडम्बना है कि बहुत सारे किसानों के पास आज तक किसान क्रेडिट कार्ड भी नहीं है। ऐसी स्थिति में किसान फसल बीमा योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजना के लाभ से भी वंचित हो जाते हैं। आज जरुरत है किसानों को सरकारी योजनाओं के बारे में सही जानकारी की, परंतु इसका भी टोटा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी दशा में किसान का परेशान और निराश होना स्वाभाविक है। विशेष जानकारी के लिए पढ़ें इस अंक में प्रकाशित लेख।
डाॅ. के. एन. तिवारी
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक

गत वर्षों की तुलना में ऐसा तो कहा ही जा सकता है कि आज देश का कृषि-उत्पादन रिकाॅर्ड स्तर पर है। विदित हो कि वर्ष 2016-17 में लगभग 27 करोड़ 50 लाख टन खाद्यान्न उत्पादन के साथ ही 30 करोड़ टन फल व सब्जियों का ऐतिहासिक उत्पादन हुआ। दुग्ध उत्पादन में भी सार्थक वृद्धि हुई है। इसके बावजूद देश के किसानों के हालात अच्छे नहीं हैं। बताते चलें, छोटी होती जोतें, लगातार एक ही तरह के फसल चक्र अपनाने से खरपतवार, कीड़े, बीमारी आदि की बढ़ती समस्या और उनके नियंत्रण के लिए पीड़कनाशियों के बढ़ते प्रयोग के कारण खेती का बढ़ता खर्च, कृषि निवेशों की वर्षानुवर्ष बढ़ती कीमतें, ऊपर से मौसम की मार एवं बाजार मूल्यों में असंतुलन आदि कृषि क्षेत्र की प्रमुख समस्याएँ हैं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं के खस्ता हालात के कारण किसान परेशान तो हंै ही, साथ ही इन बदतर सेवाओं के बावजूद इन पर लगातार बढ़ते खर्च से किसान का आहत होना, उसकी नियति सी बन गयी है। सरकारें बदलती रहीं, परंतु इन दो महत्वपूर्ण ग्रामीण सेवाओं में कोई सार्थक परिवर्तन नजर नहीं आता। अगर कुछ भी नजर आता है, तो वह है सरकारी एवं प्रशासनिक भ्रष्टाचार और उनकी निष्क्रियता। चूँकि हम किसानों की समृद्धि की चर्चा कर रहें हैं अतः हमें किसान से जुड़ी अन्य समस्याओं पर चर्चा करना जरुरी हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रामीण अस्पतालों एवं विद्यालयों में संसाधनों की कमी के साथ ही डाक्टरों और शिक्षकों की कमी के मद्देनजर गुणवत्तापूर्ण सेवा एवं स्टाफ की सत्यनिष्ठा की चर्चा व्यर्थ है। फिर भी, हद तो तब हो जाती है, जब गाँवों के गंभीर मरीज एवं प्रसूता का एंबुलेंस के अभाव में रास्ते में ही काम तमाम हो जाता है।
देश की लगभग 60 फीसदी जनसंख्या गाँवों में बसती है। गाँधी जी का कहना था कि “भारत के विकास का रास्ता गाँवो से निकलेगा”। परंतु पूर्ववर्ती सरकारों की “गरीबी हटाओ” के चतुर्दिक शोरगुल से डरकर गाँव का युवक जो गाँवों के विकास की रीढ़ था, वह तो शहर की ओर भागा। आजादी के दशकों बाद उसे ग्रामीण क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योग नजर नहीं आए। रोजगार के अवसर थे नहीं। बढ़ती जनसंख्या के अनवरत् बढ़ते दबाव के कारण छोटी होती जोतों के कारण भी युवकों का गाँवों में रुकना निरर्थक ही साबित होता। पूर्ववर्ती सरकार ने तो दूसरी हरित क्रान्ति तक की बातें की। परंतु यह नहीं सोचा कि क्या गाँव में रह रहे बचे खुचे अधेड़ व 60-80 साल के बूढ़े जो दवा के अभाव में तकिया के नीचे थर्मामीटर रखकर किसी अनहोनी की चिंता में सोते हैं, उनसे दूसरी हरित क्रान्ति की परिकल्पना कैसे की जा सकती है?
बजट 2018 मुख्य रुप से कृषि एवं किसान कल्याण विषयों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता तथा माननीय प्रधानमंत्री जी के 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के संकल्प को परिलक्षित करता है। ज्ञातव्य है कि कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का वर्ष 2017-18 का बजटीय आवंटन रु. 51,576 करोड़ था, जिसे इस वर्ष बढ़ाकर रु. 58,080 करोड़ कर दिया गया है। यहाँ यह बताना जरुरी है कि यदि कांग्रेस सरकार के वर्ष 2009 से 2014 तक के कृषि-बजट पर नजर डालें तो यह रु. 1,21,082 करोड़ था जो कि मोदी सरकार के 5 वर्षों (2014-19) में बढ़कर रु. 2,11,694 करोड़ हो गया है। यह 74.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड, नीम लेपित यूरिया, प्रधान मंत्री सिंचाई योजना, प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, कौशल विकास योजना, मुद्रा बैंक, महिला सशक्तीकरण के लिए ढेर सारी योजनाएँ, कृषि यंत्रीकरण, कृषि विस्तार उपमिशन, कृषि विपणन, वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास, डेयरी विकास, नीली क्रांति आदि। सरकार जहाँ विभिन्न फसलों की उत्पादकता तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयासरत है, वहीं किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य मिल सके, इसके लिए भी कटिबद्ध है। लंबे समय से अटकी किसानों की इस माँग को पूरा करने के लिए सरकार ने रबी 2018-19 से विभिन्न कृषि जिंसों पर किसानों को उनके उत्पाद का कृषि लागत से 50 प्रतिशत ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने का ऐलान किया है। सरकार जहाँ विभिन्न फसलों की उत्पादकता तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयासरत है, वहीं किसानों को उनकी फसल का सही मूल्य मिल सके, इसके लिए भी कटिबद्ध है। परंतु बजट में इसके लिए कितनी राशि का आवंटन किया जाएगा, इसकी बात नहीं की गई, जिसकी वजह से सरकार के इस कदम पर सवाल उठ रहे हैं। यद्यपि सरकार के प्रयास से विगत 4 वर्षों में दाल, तिलहन, धान, गेहूँ जैसी फसलों की खरीददारी में वृद्धि हुई है, इसे नकारा नहीं जा सकता है, परंतु यह वृद्धि आशा के अनुरुप नहीं है। हाँ, वित्त मंत्री ने समर्थन मूल्य पर खरीदी न होने पर चिंता व्यक्त करते हुए यह जरुर कहा कि यदि बाजार में दाम एमएसपी से कम हों तो सरकार या तो एमएसपी पर खरीद करे या किसी अन्य व्यवस्था के अंतर्गत किसान को पूरी एमएसपी दिलाने की व्यवस्था करे। इस दिशा में केन्द्र सरकार नीति आयोग एवं राज्य सरकारों के साथ चर्चा कर पुख्ता व्यवस्था करेगा, जिससे किसानों को उनकी उपज का उचित दाम मिल सके, ऐसा कहा गया है।
आज किसान परेशान जरुर है, इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु यहाँ यह प्रश्न उठना भी न्यायसंगत होगा कि क्या कल किसान इससे ज्यादा खुशहाल था। यहाँ यह बताना भी ज़रुरी होगा कि राजनीतिक दल विरोध का तड़का लगाकर किसान की असंतुष्टि की पुष्टि करने में जुटे हुए हैं और इसमें सफल हो रहे हैं या नहीं, यह तो समय बताएगा। परंतु किसान आंदोलित हैं, ऐसा दिखाई दे रहा है। ऐसा हम सभी ने देखा कि महाराष्ट्र का हाल का किसान आंदोलन तो पूरी तरह से लाल झंडे से पटा पड़ा था। यह न केवल विचारणीय है बल्कि किसानों के साथ ही हम सबके लिए चिंता का विषय है। चूँकि मोदी सरकार से किसानों को असीमित अपेक्षाएं थीं, आज भी हैं और ऐसा लगता है कि किसानों को उनसे न केवल आशा है बल्कि किसानों का विश्वास आज भी उन्हें हासिल है। अतः अच्छा होता कि प्रधान मंत्री की महत्वाकांक्षी योजनाओं को सरकारी एवं प्रशानिक तंत्र द्वारा किसानों के हित में पूरी मुस्तैदी और पूरी ईमानदारी से ससमय, सही तरीके से क्रियान्वित किया जाता। बहुत सारी योजनाओं की जानकारी आज तक किसानों नहीं है। विडम्बना है कि बहुत सारे किसानों के पास आज तक किसान क्रेडिट कार्ड भी नहीं है। ऐसी स्थिति में किसान फसल बीमा योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजना के लाभ से भी वंचित हो जाते हैं। आज जरुरत है किसानों को सरकारी योजनाओं के बारे में सही जानकारी की, परंतु इसका भी टोटा है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसी दशा में किसान का परेशान और निराश होना स्वाभाविक है।

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