अनार की उन्नत खेती एवं कीट-व्याधि प्रबंधन

अनार पौष्टिक गुणों से परिपूर्ण, स्वादिष्ट, रसीला एवं मीठा फल है। अनार का रस स्वास्थ्यवर्धक तथा स्फूर्ति प्रदान करने वाला होता है। प्रायः अनार के फल ताजे ही खाये जाते हैं। इसके दोनों को धूप में सुखाकर ‘अनार दाना’ भी बना सकते हैं, जिसका उपयोग विभिन्न व्यंजन बनाने में किया जाता है।

जलवायु - शुष्क एवं अर्ध-शुष्क जलवायु अनार उत्पादन के लिए बहुत ही उपयुक्त होती है। पौधों में सूखा सहन करने की अत्यधिक क्षमता होती है परन्तु फल विकास के समय नमी आवश्यक है। अनार के पौधों में पाला सहन करने की भी क्षमता होती है। फलों के विकास में रात में समय ठण्डक तथा दिन में शुष्क व गर्म जलवायु काफी सहायक होती है। ऐसी परिस्थितियों में दानों का रंग गहरा लाल तथा स्वाद मीठा होता है। वातावरण एवं मृदा में नमी के अत्यधिक उतार-चढ़ाव से फलों में फटने की समस्या बढ़ जाती है तथा उनकी गुणवत्ता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

भूमि - अनार का बाग लगाने के लिए 7 से 8 पीएच मान वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है। इसके पौधों में लवण एवं क्षारीयता सहन करने की भी क्षमता होती है। अतः क्षारीय भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। यही नहीं लवणीय पानी से सिंचाई करके भी अनार की अच्छी पैदावार ली जा सकती है।

उन्नत किस्में

भगवा (सिन्दूरी) - इस किस्म के पौधे मध्यम ऊँचाई के होते हैं। फल आकार में बडे़ (250-300 ग्राम) एवं लाल रंग के होते हैं। दाने लाल, रसदार और मीठे एवं खाने में स्वादिष्ट होते हैं। औसत उपज 40-100 फल प्रति पेड़ है।

मृदुला - यह एक अच्छी उपज देने वाली संकर किस्म है जो गणेश तथा रुसी किस्मों के संयोग से प्राप्त हुई है। इसके फल का आकार बडा (250-300) ग्राम), रंग लाल तथा दाने गहरे लाल होते हैं।

गणेश - इस किस्म के पौधे सदाबहार व मध्यम ऊँचाई के होते हैं। फल आकार में बडे़ (200-300 ग्राम) एवं पीले-लाल रंग के होते हैं। दाने हल्के गुलाबी, रसदार और मीठे एवं खाने में स्वादिष्ट होते हैं। औसत उपज 40-100 फल प्रति पेड़ है।

रुबी - यह संकर किस्म है। इसके फलों का औसत भार 200-250 ग्राम तथा दाने गहरे लाल व मुलायम होते हैं।

प्रवर्धन - अनार के पौधे बीज, कलम गुट्टी एवं दाब लगाकर तैयार किये जा सकते हैं। इनमें से कलम (कटिंग) और गुट्टी विधियाँ अधिक प्रचलित हैं। बीजू पौधों की तुलना में कलमी पौधों पर फल शीघ्र आते हैं।

कलम से पौधे तैयार करने के लिए एक वर्ष पुरानी शाखाओं से प्राप्त 9-10 इंच लम्बी कलमों को 1000 पीपीएम इण्डोल ब्यूटायरिक एसिड अथवा सेरेडेक्स या रुटेक्स (जड़ विकसित करने वाले हार्मोन्स) से उपचारित करके पौधशाला में लगाते हैं। कलम लगाने के लिए फरवरी-मार्च अथवा जून-जुलाई का समय अधिक उपयुक्त होता है। कलम लगाने के लिए बालू रेत, मिटटी व सड़ी हुई गोबर की खाद के बराबर मात्रा के मिश्रण से 25x10 सें.मी. आकार की पॉलिथीन की थैलियाँ भरकर तैयार कर लेते हैं, फिर इनमें कलमें लगाते हैं। कलमें क्यारियों में भी लगाई जा सकती हैं।

पौधे लगाना -

दूरी - 5x5 मीटर

गड्ढे का आकार - 60x60x60 सें.मी.

गड्ढे भराई का मिश्रण प्रत्येक गड्ढे में 5 किलोग्राम वर्मी कम्पोस्ट अथवा 10-15 किलोग्राम गोबर की खाद, आधा किलोग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 50 ग्राम मिथाइल पैराथियान चूर्ण को मिट्टी में मिलाकर भरना चाहिए। यदि तालाब की मिट्टी उपलब्ध हो तो उसकी भी कुछ मात्रा गड्ढे में डालनी चाहिए। गड्ढों को मानसून आने से पहले ही भर देना चाहिए। पौधे लगाने का कार्य जुलाई-अगस्त अथवा फरवरी-मार्च में करना चाहिए।

अन्तराशस्य - आरम्भ के तीन वर्षो तक बाग में सब्जियाँ जैसे मटर, ग्वार, चौलाई, बैंगन, टमाटर आदि ली जा सकती हैं।

सधाई - अनार के पौधों को उचित आकार व ढाँचा देने के लिए स्थाई एवं काट-छाँट की नितान्त आवश्यकता होती है। एक स्थान पर चार तने रखकर अन्य शाखाओं को हटाते रहें।

सिंचाई - अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक फल उत्पादन के लिए गर्मी के मौसम में 7-10 दिन के अन्तराल पर तथा सर्दी में 15-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए। फल विकास के समय वातावरण तथा मृदा में नमी का असंतुलन रहता है तो फल फट जाते हैं। इसके लिए फल विकास के समय भूमि तथा वातावरण से निरन्तर पर्याप्त नमी बनाये रखनी चाहिये।

बहार नियंत्रण - अनार में वर्ष में तीन बार फूल आते हैं जिसे बहार कहते हैं।

  1. अम्बे बहार (जनवरी-फरवरी)
  2. मृग बहार (जून-जुलाई)
  3. हस्त बहार (सितम्बर-अक्टूबर)

वर्ष में कई बार फूल आना व फल आते रहना उपज एवं गणुवता की दृष्टि से ठीक नहीं रहता है। इसलिए अवांछित बहार का नियंत्रण कर जलवायु के अनुसार कोई एक बहार की फसल लेना लाभदायक रहता है।

नियंत्रण - तीनों बहारों में से कोई एक इच्छित बहार का उत्पादन लेने हेतु किए जाने वाले प्रबन्ध को बहार उपचार कहा जाता है। जिसका जल उपलब्धता, बाजार भाव, गुणवत्ता इत्यादि के अनुरुप चयन किया जाता है।

वर्षा के जल का समुचित उपयोग करने हेतु मृग बहार उचित रहती है। फसल में इस हेतु मार्च-अप्रैल में सिंचाई बन्द कर दी जाती है तथा मई माह में थांवलों की खुदाई कर खाद एवं उर्वरक दिये जाते हैं तथा हल्की सिंचाई की जाती है। इसके पश्चात् 2 हल्की सिंचाई और की जाती हैं जिससे जुलाई में फूल आते हैं। फूल आने के पश्चात् सिंचाई नहीं करनी चाहिए अन्यथा फूल झड़ जायेंगे। फूल से जब मूंग के दाने के आकार के फल बन जाएं तो सिंचाई करनी चाहिए। फल के विकास के समय आवश्यकतानुसार लगातार सिंचाई करते रहना चाहिए।

प्रमुख व्याधियाँ

पत्ती एवं फल धब्बा रोग - इस रोग का प्रकोप अधिकतर मृगबहार की फसल में होता है। वर्षा ऋतु में अधिक नमी के कारण पत्तियों और फलों के ऊपर फफूँद के भूरे धब्बे दिखाई देते हैं जिससे रोगी पत्तियां गिर जाती हैं तथा फलों के बाजार मूल्य में गिरावट आ जाती है। फल सड़ने भी लगते हैं।

नियंत्रण

(1) बाग की समय-समय पर सफाई करते रहना चाहिए।

(2) रोगग्रसित फलों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए।

(3) मैन्कोजेब या जिनेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 15-20 दिन के अन्तराल पर तीन-चार बार छिड़काव करना चाहिए।

पत्ती मोड़क (बरुथी) - इस रोग के प्रभाव से पत्तियां सिकुड़ कर मुड़ जाती हैं जिससे पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अक्सर पौधे की बढ़वार व फलन बुरी तरह प्रभावित होता है। यह रोग सितम्बर के महीने में अधिक फैलता है।

नियंत्रण - ओमाइट या इथियोन 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। 15 दिन के बाद दूसरा छिड़काव भी करना चाहिए।

तेलीय धब्बा रोग - यह अनार का सबसे भयंकर रोग है। इस रोग का प्रभाव पत्तियों, टहनियाँ व फलों पर होता है। शुरु में फलों पर भूरे-काले रंग के तेलीय धब्बे बनते हैं। बाद में फल फटने लगते हैं तथा सड़ जाते हैं। रोग के प्रभाव से पूरा बगीचा नष्ट हो जाता है।

नियंत्रण - कैप्टॉन 0.5 प्रतिशत या बैक्टीरीनाशक 500 पीपीएम का छिड़काव करना चाहिए और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम, स्टेªप्टो साइक्लिन 0.5 ग्राम का छिड़काव करें।

पर्ण एवं फल चित्ती रोग - इस रोग के नियंत्रण हेतु डाइथेन एम-45 या कैप्टान 500 ग्राम 200 लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अन्तराल में 3-4 बार छिड़काव करें।

प्रमुख कीट

तना छेदक - यह कीट पेड़ की छाल को खाता है तथा छिपने के लिए अन्दर शाखा में गहरे तक सुरंग बना लेता है। जिससे शाखा कभी-कभी कमजोर पड़ जाती हैं।

नियंत्रण - सूखी शाखाओं को काट कर जला देना चाहिए। सुरंग में 3 से 5 मिलीलीटर केरोसिन तेल डालें तथा सुरंग को गीली मिट्टी से बंद कर दें। क्यूनालफॉस 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर शाखाओं तथा डालियों पर छिड़कें।

अनार की तितली - मादा तितली पुष्प कली पर अण्डे देती है। इनसे लटें निकल कर बनते हुए फलों में प्रवेश कर जाती हैं। फल को अन्दर ही अन्दर खाती हैं। फलस्वरुप फल सड़ कर गिर जाते हैं।

नियंत्रण - फल बनते समय कार्बारिल 50 डब्ल्यू पी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

मिली बग - इसके अव्यस्क शिशु, प्रायः नवबर-दिसम्बर में बाहर निकल कर तने के सहारे चढ़ते हुए वृक्ष की कोमल टहनियों एवं फूलों पर एकत्रित हो जाते हैं तथा रस चूस कर नुकसान पहुँचाते हैं। इसके प्रकोप से फल नहीं बन पाते हैं। इसके द्वारा एक तरह का मीठा चिचिपा पदार्थ छोड़ा जाता है।

नियंत्रण - अगस्त-सितम्बर तक पेड़ के थांवले की मिट्टी को पलटते रहें जिससे अण्डे बाहर आकर नष्ट हो जायें। मिथाइल पैराथियॉन चूर्ण 50-100 ग्राम प्रति पेड़ के हिसाब से थांवले में 10-25 सेन्टीमीटर की गहराई में मिलायें। शिशु कीट को पेड़ पर चढ़ने से रोकने के लिए नवम्बर में 30-40 सेन्टीमीटर चौड़ी 400 गेज एल्काथिन की पट्टी जमीन से 60 सेन्टीमीटर की ऊँचाई पर तने के चारों ओर लगाएं तथा इसके निचले 15-20 सेन्टीमीटर भाग तक ग्रीस का लेप करें। यदि पेड़ पर मिली चढ़ गयी हो तो इमिडोक्लोप्रिड 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर या डाईमिथोएट 30 ई सी 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

More on this section